शनिवार, 26 सितंबर 2015

व्यक्ति या विचार

व्यक्ति या विचार



ये जो

मानव का जन्म है

ये

मानव द्वारा

पृथ्वी पर देखा गया

सबसे सुन्दर स्वप्न है


जब

जन्म देते हैं

पुरूष और स्त्री

शिशु को

वे केवल

एक दूसरे को

भोगते नहीं हैं

ना ही वासना  को

बल्कि

बुनते हैं

एक विचार

वीर्य और रक्त से

यही विचार

निराकार

अपनी

सार्थक परिणति के लिए

देह के रूप में

पाता है आकार

जब तक है

विचार

तब तक है

व्यक्ति

जिस दिन व्यक्ति का

विचार के रूप में

अस्तित्व

समाप्त हो जाता है

जीवित

रह जाती है

देह

व्यक्ति मर जाता है ।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

सीता को सोने का मृग चाहिए






सीता को सोने का मृग चाहिए



अभी – अभी

उछलता, कूदता, किलकारियां मारता

गया है सोने का मृग

बस गया है वो सीता की आंखो में

सीता स्नेह से

राम के कंधे पर हाथ रखती है

कहती है –

अहा ! कैसा सुन्दर है,

कभी देखा नहीं ऐसा मृग

कितनी सुन्दर लगूंगी

मैं इसकी मृगछाल पहनकर।

राम जानते हैं सोने के मृग नहीं होते

कहते भी हैं सीता से

पर हठ पर है सीता

उसे

सोने का मृग चाहिए !

राम सोचते हैं –

दे ही क्या पाया हूं मिथिला कुमारी को

आंसू, पीड़ा, आत्मीयों से बिछोह और

वनवास,

और धनुष उठा कर चल पड़ते हैं,

सीता को सोने का मृग चाहिए !

‘लक्ष्मण’ – ‘लक्ष्मण’ की आवाजें दे

ढेर हो गया है मायावी,

सामने पड़ा है

विशाल, दैत्याकार, लहूलुहान शरीर

अपनी अंतिम परिणति में

कितना वीभत्स है सोने का मृग

स्तब्ध खड़े हैं राम

ठगे गए हैं वो

पर वो क्या करते,

सीता को सोने का मृग चाहिए !

सीता को

संदेह हो गया है लक्ष्मण पर,

उसकी दृष्टि में

अब समर्पित एकनिष्ठ भाई नहीं है वो,

बल्कि

अवसर का तलाश में,

भाई का हत्यारा है वो,

लक्ष्मण जानते हैं राम को कोई नहीं हरा सकता

गलत जानते हैं वो,

सोने का मृग सबको हरा सकता है !

अब जंगलों में भटक रहे हैं राम

वृक्षों, पर्वतों से पूछते,

अपने दुर्भाग्य से जूझते

अब उन्हें सोने का मृग नहीं चाहिए

उन्हे सीता चाहिए

जंगल में गूंज रहा है

रावण का अट्टहास

रावण के हाथों पड़

सीता कर रही है विलाप

अब उसे सोने का मृग नहीं चाहिए

अब उसे राम चाहिए

राम को सीता चाहिए,

सीता को राम चाहिए

सोने के मृग के बिना भी सुखी था उनका जीवन

आपको क्या चाहिए ?

*********
anilhindi@gmail.com

हम सब कवि हैं

 हम सब कवि हैं



हम सब

कवि हैं

हाँ ,

हम सब ही हैं

कवि।


सिर्फ

जो छपे

दुनिया ने जाना

स्थापित हुए

बड़े-बड़े लोगों ने माना

वो

जो बुनता है

वो

जो चुनता है

वो जो 

देता है आकार माटी को

वो जो

लाता है हरियाली

चीर कर

धरती की छाती को

वे

दुधमुहां

जो बनाता है

रेत में घर

वो जो

बहाता है पसीना

गढ़ता है नई दृष्टि

कूटता है पत्थर

वो जो

भीनी-भीनी गन्घ लेकर

इस बार भी खिला

वो जो

तिनका-तिनका बटोर

बनाती है घोंसला


सभी हैं

कवि

सभी ने जिए हैं

कल्पना के क्षण

सभी ने

झेली है

प्रसव वेदना

सभी ने किया है

कुछ न कुछ

सृजन

सभी हैं कवि

तभी है सृष्टि

हम सबकी तलाश है

अपने-अपने

तनाव की अभिव्यक्ति

जिस दिन

हम

कवि नहीं होंगे

विश्वास कीजिए

हम कहीं नहीं होंगे।

मोर्चे पर: भीड़

मोर्चे पर: भीड़: भीड़  अगर मुझे पता होता  कि  हर सीधी और टेढ़ी गली बाजार के रास्तों से भीड़ बन जाती है तो मैं घर वापिस लौट जाता ...

स्वीकारोक्ति



 स्वीकारोक्ति





जब-जब

फटी हुई बिवाइयों के बीच से

एक चेहरा झांकता है

और

मुझसे पूंछता है-

क्यों भाई

क्या तुम

मुझे सी सकते हो ?

जब-जब

घातों , लातों और प्रतिघातों से

क्षत- विक्षत

अंधेरे में

कोई मुझे टटोलता है

और

मुझसे पूछता है-

क्यों भाई

क्या तुम

मेरा अंघेरे पी सकते हो?

जब-जब

कोई

मुझसे पूछता है-

क्या कविता में

तुम

मुझे

हुंकार और गर्जन कर

उनके विरूद्व

सीधी सपाट भाषा में

जी सकते हो 


विश्वास कीजिए

तब-तब

मैंने अपने आप को

अपने ही सामने

कलम और बंदूक फेंके

आत्मसमर्पण की मुद्रा में

खडा पाया है

क्या

तुमने भी कवि

क्या

तुमने भी ?

*****
anilhindi@gmail.com

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

भीड़


भीड़ 



अगर मुझे पता होता 
कि 
हर सीधी और टेढ़ी गली
बाजार के रास्तों से भीड़ बन जाती है
तो मैं

घर वापिस लौट जाता

जहाँ 
नकेल और चारा 
मेरा इंतजार कर रहे थे


भीड़ में घुसने तक
मेै
सोचता रहा-
कैसे छुपाऊंग
तलवों में लगा खून ?
रात में ही मैंने
दुलत्ती से तीन मासूमों को मारा है
चेहरे पर कहीं
चमक ही जाएंगें
रामलीला में डकारे
चंदे के सिक्के
पर भीड़ में घुसने के बाद
मेरा अपराधबोध समाप्त हो गया

वहाँ 
सब मुझ जैसे ही चेहरे थे
मुझ जैसे ही 
शांत, शालीन, सौम्य
और 
मर्यादित

सब पिछले वालो के 
आगे वालो की 
जेब में हाथ थे
ये ना कहना
कि 
वो जेबतराश थे
जब तक तुम ये ना जान लो
कि
उनके क्या हालात थे

ठेलपेल थे
धक्का था
लोग इसी मे
प्रगतिशीलता का 
एहसास पा रहे थे

क्या जरूरी था
उन्हें बताना 
कि हर कदम पर
वो आगे नहीं
पीछे आ रहे थे

जोर - जोर से आवाजें
लेकिन
कोई नहीं सुनता
एक मां ने 
बेटे को
चिपका लिया
छाती के साथ
जब उसे पता लगा
लोकतंत्र घूम रहा है
यही कहीं आसपास

यकायक
कोई पैर
फुटपाथ पर
किसी अंतड़ी को कुचल जाता
बवेला मच जाता
अगर आयोजक
जन-गण-मन का रिकार्ड ना बजाता
लोगों ने 
फिर से
हरी बतियो के इशारे पर 
चलना शुरू कर दिया है



सुंदर !
कितना सुंदर !!
यह हाट
यह बाजार
इसका रचियता कोई ब्रह्मा नहीे
इसका रचियता है - साहूकार

ट्रैफिक पुलिस वाला
व्यवस्था के पड़ोस में बैठा
बीड़ी पीता
ऊँघ रहा है
उसे जगाओ
वो नई ट्रैफिक व्यवस्था बतलाएगा
देखो 
जो रास्ते
मंदिर , मस्जिद, गुरूदारे की और जाते हैं
उनपर मत जाना
आजकल वहां
भगवान नही मिलते है
कही अंदर घुस जाओ
और फिर
घबराते हुए भागो
कहो-
कहां हैं यहां
राम, अल्लाह और वाहे गुरू !
क्या आजकल यहाँ
साँप पलते हैं !

दोस्तों के कहने पर
मैं भी
एक दुकान पर गया
पूछा- क्यो भाई साहब
इस बार
सफेद कबूतरों की गर्दन मरोड़ने का खेल
कहाँ हो रहा है !
उसने 
मेरी गर्दन की ओर देखा
मैं झेंप गया

दूसरी दुकान पर 
मैंने 
पारिचारिका से पूछा - क्यो जी 
' ये पोस्टर है या आदमी
पहचानिए "
प्रतियोगिता कहाँ हो रही है ?
उसने मुझसे पूछा - आपने
यहाँ कोई आदमी देखा है ?
इससे पहले 
वो मुझे घूरती
मैं झेपता हुआ
आगे बढ़ चुका था

अब मैंने
उस 
अकड़कर चलते हुए
नौजवान से पूछा - क्यो भाई
तुम
इतना अकड़ कर
क्यो चल रहे हो ?
क्या तुम्हारा भी कोई परिचित
रोजगार दफ्तर में काम करता है ?
अब 
वो झेंप गया

कहीं कोई उत्तर नहीं
इसी तरह
बगले झांकते हुए लोग
वापिस
घरों में जा रहे हैं
और मैं जान चुका हूँ
भीड़ तो
अपने आपको भुलाने का 
जोरदार बहाना है
आदमी की 
बुनियादी जरूरत
भीड़ नहीं 
नंगा गुसलखाना है ।

अस्तित्व बोध

अस्तित्व बोध


मैं समझ चुका था
ये समय 
लोगों की आँखों मे अपना अस्तित्तव आँकने का नहीं है
बल्कि अपने जीने के लिए 
मुनासिब वज़ह जानने का है।

और ऐसे में
चाय के प्याले में 
अपनी उम्र आँकने के बाद
मैं घबरा गया
मैंने दाढ़ी को छुआ
दाढ़ी-
 दाढ़ी की जगह थी
मूँछ-
मूँछ की जगह
नाक-
नाक की जगह थी
कान-
कान की जगह
नहीं
ऐसा नहीं हो सकता 
जब कुछ भी सही नहीं है
तो
ये कैसे हो सकता है
सब चीजें
करीने से शऱीर पर सजी हो
कहीं कुछ गहरी गड़बड़ जरूर है।
मैं जानना चाहता था
क्या मरने से पहले 
मैं जिन्दा हूँ !
मुझे कोई मुगालता नहीं था
मैं पागल हो चुका था

मैं घबरा गया
अर्थशाश्त्र ने मुझे बेतहाशा तोड़ा
दर्शनशाश्त्र ने मुझे कहीं का ना छोड़ा
सब तरफ भूल भुलैया थे
भटकाव थे
हो सकता है
सधे हुए न हों
मेरे ही पैर ( पर विश्वास है गलती सिर्फ अनुवाद की नहीं थी)
सुबह तक तो ऐसा नहीं था।

अचानक मैंने महसूस किया
मेरे नीचे जमीन नहीं है
या कि मैं उल्टा चल रहा हूँ
दिशाहीन अंधेरों के बीच
अपने महान संक्लपों के सामने
मरगिल्ले कुत्ते सा खड़ा 
मैं जीना चाहता था
और 
उसके लिए
किसी भी हद तक जाने को तैयार था

मैंने सोचा 
अब मैं 
उस आदमी से नहीं मिलूंगा
जो सुबह
कमीज के पीछे
मेरी जेब टटोलता रहा
और में
मेरी आत्मा भी है
मेरी आत्मा भी है
यही बोलता रहा

अब कैलेण्डर में सिर्फ दिन नहीं  हैं
सिर्फ तिथियां हैं
वो मेरा बचपन था
जब ये शहर अपना हुआ करता था

यहाँ जिसकी भी अक्ल और आत्मा
काँच के शीशों में कैद नहीं है
सभी अपराधी हैं
और जिनके हाथ
खून से रंगे हुए है न्यायधीश

मेरे पास 
न गीत थे
न राग
न सावन
न फाग
न मस्ती 
न ख्वाब
पेड़ से पहाड़ तक 
सिर्फ पतझड़ थी मेरे पास
मैंने सोचा 
क्यों न यहीं से शुरू करूं?
और में मजे से
खुरदरे पहाड़ पर
फिसला, चढ़ा, गिरा , पड़ा
मैं खुश था
मैंने 
सूखे कीचड़ भरे बरसाती नाले के पास बैठकर
जोर-जोर से
सावन के गीत गाए
सूखे-पीले पत्तों को चूमा
फूलों पर फतवे कसे
कांटो के गुच्छे
कोट के बटनहोल पर लगाए
मैं खुश था

मेरे पास बेतहाशा प्यार था
लुटाने को
असीम घृणा थी
बरसाने को
और 
सबसे बड़ी बात यह थी
इस सबकी वजह से
मैं शर्मिन्दा नहीं था

बात समझने की 
महज़ इतनी भर थी
सौन्दर्य
वस्तु में नहीं 
दृष्ठि में है
और परिष्कृत सौन्दर्य बोध की पहली और आवश्यक शर्त
उसका मौलिक और असाधारण होना है

अब मुझे 
जीने के लिए
कोई बहाना नहीं चाहिए था

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