शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

बीच बहस में -भारतीय मीडिया





भारतीय मीडिया


बीच बहस में 


अनिल जोशी


इन बहसों में 
किसी का किसी से 
प्यार दिखता नहीं है
चूंकि वे कहते हैं कि
चैनलोंं पर 
प्यार बिकता नहीं है

बिकती है
घृणा 
हिंसा
झूठ


बिकता है 
तमाशा
मुर्गों की तरह  इंसानों को लड़ाओ
और लोकप्रियता पाओ
ये है बहुत आसान है !
एक तरफ धर्मांध हिंदू 
दूसरी तरफ हैं कट्टर  मुसलमान !
पर क्या  यही  उन्मादी लोग
हैं देश की पहचान  ?

 इसके बीच 
हैं करोड़ों -करोड़ों धर्मनिष्ठ हिंदू 
सिख  , ईसाई 
करोड़ों- करोड़ों अपने ईमान के पक्के मुसलमान
और  आस्था और अनास्था के बीच झूलते दूसरे 
वे सभी हैं  पहले इंसान 
उनके पास जाग्रत  विवेक है 
उन्हीं की  वजह से यह देश एक है!
उनकी भी आवाज बनो 

जिनके भीतर भेड़िया नहींं गुर्रा रहा
साँप नहीं लहरा रहा
उनकी भी आवाज सुनो!

खबर को रहने दो खबर
बाज आओ
उसे सनसनी ना बनाओ!


देखो 
लोगों की आस्था को  मत बदलो कट्टरता में
घृणा को 
तर्क मत दो
डर को  मत दो वज़ह
अविश्वास को खाद -पानी ना दो
उन्माद को मत दो जमीन 


इस देश पर रहम खाओ
हिंसा को आवाजें मार-मार कर  
मत  बुलाओ

द्वैष को  औजार ना दो
विचार को
मत पकड़ाओं हथियार
ये गांधी का देश है
संवाद को 
मत बनाओ बाजार


सुनो 
दंगों और उन्माद का नियम समझो
कहते हैं  देह मरती है
पर आत्मा
कभी अमर है

पर जब फैलती है उन्माद की आग
मनुष्यता कराहती है
देह तो मरती है 
बहुत बाद में
पहले आत्मा मर जाती है

बाज आओ
भोले -भाले लोगों  की आत्मा को मारने वाले
 वैचारिक वायरस के टीके
 मत लगाओ


जो विवेकशील है 
उन्हें सराहो
जो आग में पानी डाल रहे हैं
उन्हें आगे लाओ
 कबूतरों को 
घृणा की मशाल मत पकड़ाओ

तुम्हें किन स्वार्थों ने जकड़ा हुआ है
तुम देख नहीं पा रहे 
तुमने शब्दों को बंदरों के  उस्तरे की तरह पकड़ा हुआ है



तुम नहीं जानते तुम्हारे पास क्या है
शब्द 
तुमने क से कबूतर नहीं 
क से कत्ल बताया
तुम्हें ह से हल नहीं ह से हथियार पसंद है
शब्दों पर स्वार्थों का पहरा हैं
तुम्हारा  अपना खतरनाक ककहरा है

शब्द
समय और मनुष्य के पार देखता शब्द
व्यक्ति के  अंतर्मन में झांकता शब्द
 शब्द जिससे इंसान  विश्व को समझता हैं- टटोलता हैं
जिन शब्दों में मां की गोदी से निकल
 मनुष्य ज्ञान  के संसार में पहली बार आँख खोलता है
 हाँ हाँ- वही शब्द
  इसी शब्द को ऋषियों ने  ब्रहम कहा था


शब्दों के सौदागर !
क्या तुमने
कालिदास, तुलसी, कबीर के
सहज, मर्यादित, सच्चे शब्दों के अमृत को पिया है?
क्या तुमने रविन्द्र , मुक्तिबोध, गालिब के
स्वतंत्रता, समानता 
और 

गंगा- जमनी तहज़ीब के सच को जिया  है?

सुनो
पवित्र शब्दों में भारत के प्राण हैं
इनके निर्लज्ज, स्वार्थी  दुरूपयोग की वजह से
भारत की आत्मा लहुलुहान है


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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

प्रवासी मजदूरों का पलायन



सभ्यता की शाम 


अनिल जोशी


जैसे फूल में होती है सुगंध
सरसों में पीलापन
आम में मिठास
ओठों पर प्यास
वैसे ही उसकी सांसों में बसा हुआ है घर
इसलिए
उसे तो  घर ही जाना है

उसे घर जाना है
‘पर तुम्हारा घर तो यहां भी है।’’
‘वह रूआँसा हो जाता है
यहां में रहता हूँ 
किराए का छोटा सा मकान है
मेरा घर गाँव में ही है।’’

वह सूनी आंखों से  देखता है
 दीवारों और 
चारों तरफ फैले ईंटों के अनंत  विस्तार को  
जिसमें उसकी सांस 
रोज कम हो जाती हैं
उसे यह नहीं पता
 कि उसे कोरोना हो गया तो
वह आखिरी सांस कैसे छोड़ेगा!
कौन से सरकारी अस्पताल की बेंच पर 
निपट परायों के बीच
 दम तोड़ेगा।
उसे घर जाना है

दरअसल उसे उपचार पर भरोसा नहीं है
उसे लगता है 
मां ने पूजा की है
पत्नी ने वट सावित्री व्रत 
पिता ने दुआएँ मांगी हैं
दवाई और उपचार से क्या सधेगा
अगर बचेगा तो 
वह 
उन्ही की वजह से बचेगा
उसे तो घर जाना है

उसे लगता है
मकानमालिक के लिए है वह सिर्फ-
 किराएदार 
कारखाना मालिक के लिए सिर्फ-
 मजदूर
सड़क पर चलने वालों के लिए 
-ओए बिहारी 

कोरोना बीमारी है
पर मनुष्यता का अपमान
 यह तो महामारी है


उसके लिए कौन यहाँ अपना है!
शहर एक भयावह सच  है तो
घर, गाँव एक  खूबसूरत सपना है
उसे घर जाना है

हाय 
राजनीति ने 70 सालों में 
इतना भी अर्जित नहीं किया विश्वास
कि 
मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री  रोकने के लिए खड़े हैं जोड़ कर हाथ
सुन नहीं रहा उनकी बात
वह जिद पर है 
उसे नहीं रहना इस कठिन समय में
हमारे संवेदनहीन शहर में
उसे घर जाना है


मनुष्यता सड़क पर है
उसे पुलिस ने मुर्गा बना रखा है
वह उकडूं चल रहा है
उसे कोई परेशानी नहीं है
 शहर में रोज  ऐसे ही चलवाते हैं
रेंगना उसकी सामान्य मुद्रा है
पर चाहे जो  हो
उसे घर जाना है

उसे चलना है 
पांच, दस, पचास, सौ , दो सौ , चार सौ कि मी
भूख , प्यास , गर्मी , तेज धूप , पाँव में छाले
पता नहीं वह कहाँ तक पहुँचता है
वह जीता है !
या मरता है!
व्यवस्था को क्या फर्क पड़ता है!
बस उसे घर जाना है



यह सभ्यता की शाम है
और
जैसे पंछी लौटते हैं 
घोंसले में
जैसे पशु लौटते है 
अपनी मांदों में
अपने विस्तार को भूल
पंख समेट रही है सभ्यता 
जिस- जिस को  इस सभ्यता ने
 घर से बेघर कर दिया था
वह अब जिद पर है
उन्हें घर जाना है













मंगलवार, 17 मार्च 2020

आख़िर इतनी घृणा कहाँ से आती है



दिल्ली दंगों पर कविता -2

आख़िर इतनी घृणा कहाँ से आती है


किसी के पास है विजेता का ‘उन्माद ‘
किसी के पास विजित का ‘प्रतिशोध’
हमारी जड़ो में बैठ गया है 
ग़लत इतिहास बोध 

किसी के पास वैश्विक ‘जेहाद ‘ के सपने हैं 
तो किसी के पास ‘अब बहुत सह लिया ‘के नारे है
इनके आगे बाक़ी सब बेचारे हैं 

यह सवाल अस्मिता का है 
बहुत से लोग बताते हैं 
पर एक अस्मिता का पाँव दूसरी की गर्दन पर क्यों रखा है 
यह क्या मजबूरी है ? 
अस्मिताओं का सतत युद्ध किनके लिए ज़रूरी है !
ये अस्मिता
अभिव्यक्ति और पहचान की आवाज़ नहीं 
बल्कि राजनीति का हथियार है
इसका धंधा इंसानियत का व्यापार है 
पर कुछ के पास तो टैंक हैं 
उनके पास सदाबहार नुस्ख़ा 
वोट बैंक है 

फ़ेसबुक , वटसएप , ट्विटर 
भड़ास निकालने का अड्डा है
यहाँ दुर्भावना का गहरा गड्डा है 
जहां हमारे द्वेष , घृणा , हिंसा को शब्दों का आकार मिलता है 
बेवजह को वजह मिलती है 
बामियान के बुद्ध की गर्दन 
पहले विचारों की तलवार से कटती है 
हम समझ लेते हैं 
कि हम नहीं कोई अकेले धर्मांन्ध, विचारों के दीवालिया , चोर हैं 
हमें ख़ुशी होती है, हमारे जैसे मूढ़मति  सैंकड़ों और हैं 
अब यह समूह नहीं माफ़िया हैं
हमारे पास एक ख़तरनाक ग़ज़ल का 
का रदीफ और क़ाफ़िया है
अब उन सब पर धिक्कार है 
जिनके दिल में इंसानियत के लिए प्यार है 
उग आता है कैक्टस का जंगल 
फैल जाता है संवेदनहीनता का रेगिस्तान 
धीरे -धीरे इंसान नहीं रह जाता है इंसान 

फिर अब हम वहाँ है जहाँ विचारों का अकाल है 
रोज टेलिविज़न पर नेशन पूछता एक सवाल है 
टी आर पी के लिए देश के लिए रोज दी जाती कैसी दिलचस्प दवाई 
हाय जो विचारकनुमाा राजनीतिज्ञ बैठा है 
वह सच में है कसाई
उसके पास जो तथाकथित  विचार है 
वो दरअसल एक हथियार है 
उसकी हरेक बात , हर विचार , हर तर्क एक गहरा षड्यंत्र है 
इनके पास सद्भावना ख़त्म करने का अचूक मारक मंत्र है 
विवेकशील, संतुलित व्यक्ति उनके लिए ज़ीरो है 
हर आक्रामक , ख़ूँख़ार व्यक्ति छोटे पर्दे पर  हीरो है
ठहरिए जिसे आप एंकर कह रहे हैं 
वह जानता है वह खड़ा कर रहा नाहक बवाल है 
पर वह क्या करे वह तो एक दलाल है 
एंकरों और वक्ताओं के पास ख़ूब जोश है 
अब हम वहाँ तक आ गए कि 
सारी जनता वैचारिक रूप से बेहोश है 

अब वहां पहुँचे जहाँ इस कहानी का तर्कसंगत अंजाम है 
यहाँ राजनीति का नंगा हमाम है , 
यहाँ सिसकते लोग है , लाशें है 
देह और दिल पर लगा गहरा घाव है
उन्हें क्या 
उनके सामने तो अगला चुनाव है 
ये दिलों को , दिमाग़ों को, ख़ून को बाँटेंगे 
लोग बँट चुके हैं 
अब चुनाव की खड़ी फ़सल ये काटेंगे 

अब द्वैष का गहरा कुआँ है
चारों तरफ नफ़रत का धुआँ है
और हम देखते हैं कि प्रेम , संवेदना , भाईचारा सब धू -धू कर जल रहा है 
हमारे देखते -देखते एक घृणा का समंदर इंसानियत को निगल रहा है 


दिल्ली दंगों पर लिखी एक कविता

गंगा - जमनी तहज़ीब

मै गंगा जमनी तहज़ीब को ढूँढते ढूँढते 
यहाँ आ गया हूँ
शिव विहार के पास इस नाले में
जहाँ बोरियो मैं बँधी है विभाजन की विरासत की सडांध
हर छोटा बड़ा शहर
बसा होता है
पानी की निर्मल धार के पास
जो उसे देती है जीवन
और उजास
इसमें यमुना का कैसा पानी है
क्या इसमे तुलसी , कबीर , रसखान, गालिब और ख़ुसरो
की वाणी है
नाले में है टूटी
हुई बोतलें , फटे हुए लिथडे, घरों का गंद
बोरियों में हैं लाशें बंद
किसी का धड़ है ,
किसी की टाँग
तैर रही है किसी की कटी हुई ज़बान
किसी के अपने है
किसी के सपने हैं
शिव विहार में
सिर्फ़ दो जगह भीड़ है
श्मसान मे या क़ब्रिस्तान में
बच्चे गांधी जी पर निबंध तैयार कर रहे है
गाधी जी इस कीचड़ भरे नाले के पास
बोरी में बंद है
बेबस और उदास
शहर में इतना बड़ा काण्ड
और
उन्हे बना दिया है एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल ब्राण्ड
हर चीज़ बँट गई है
हाथ , नाक , कान , दिल , सीना
रगों का ख़ून, हाथ का पसीना
हर कोना
वैसा ही घृणित ,वैसा ही कमीना
चारों तरफ पसरा हुआ एक सन्नाटा है
गंगा -जमनी तहज़ीब का असली सच
यह
शिव विहार का यह नाला बताता है

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

हिंदी पट्टी के नौकरियों के प्रति अंधमोह का समाजशास्त्र :अलका सिन्हा की चर्चित कहानी ‘चौराहा ' का नाट्य रूपांतरण



अलका सिन्हा की चर्चित कहानी चौराहा पर आधारित नाटक परीक्षा का मंचन : हिंदी पट्टी के नौकरियों के प्रति अंधमोह का समाजशास्त्र

दिनांक 21 दिसंबर , 2019 को दिल्ली  के  मुक्ताकाश सभागार  में हिंदी की सुपरिचित कथाकार अलका सिन्हा की चर्चित कहानी  चौराहा के नाट्य रूपांतरण परीक्षा का मंचन किया गया।   मुंबई के ग्रुप पूर्वाभ्यास द्वारा नवीन अग्रवाल के निर्देशन में और सोच संस्था के श्री विनयशील के संयोजन मे यह प्रस्तुति थी । कहानी का नाट्य रूपांतरण श्रीमती प्रेरणा अग्रवाल द्वारा किया गया है। इस मंचन में सभागार दिल्ली के लेखकों और नाट्य प्रेमियों से खचाखच भरा था। प्रस्तुति अत्यंत सराहनीय थी ।  नाट्य रूपांतरण को  उपस्थित प्रबुद्द समाज की भूरी -भूरी प्रशंसा मिली । 
मैं पहले कहानी और नाटक  से जुड़े कुछ प्रमुख बिंदुओं उसके थीम और नेरेटिव के बारे मे बात करना चाहूंगा  । यह मुख्य रूप से ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है जिसमें पिता एक सरकारी नौकर है जिनका बेटा नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहा है । स्कूलों में चलने वाली धांधली या निजी क्षेत्र की नौकरी में मालिकों का मनमानापन उसे कहीं टिकने नहीं देता । पिता रिटायरमेंट के कगार पर है  , उन्हें अपने परिवार का  भविष्य अंधकारमय दिखता है और हालात ऐसे हो जाते है कि पिता को ऐसा लगता है कि क्यों ना वह आत्महत्या कर ले,  जिससे उसके पुत्र को उसके स्थान पर नौकरी मिल जाए ।  वह आत्महत्या का असफल प्रयास करता है। पर अंतत: : कहानी एक आशा की किरण के साथ खत्म होती है जब वह युवक नौकरी के बजाए एक ट्यूशन सेंटर खोलने का निर्णय कर नौकरियों के पीछे दौड़ने के बजाए अपना भविष्य अपने हाथ मे लेकर संवारने का निर्णय लेता है। 

इस कहानी को कई वर्ष मैंने पढा था और उस संग्रह मे प्रकाशित कहानियों में से इस कहानी मे नाटकीयता की संभावना सबसे अधिक दिखाई दी थी। संकल्प जोशी ने इस कहानी के कुछ अंशों का अत्यंत प्रभावी और सफल नाट्यपाठ किया था। प्रसन्नता की बात है इस कहानी का नाट्य मंचन किया जा रहा है।  
आइए इस कहानी के मुख्य आशय पर चर्चा करें।   नाटक में प्रदर्शित समस्याएं  इस एक मध्यमवर्गीय परिवार की नहीं बल्कि हिंदी पट्टी के सभी मध्यमवर्गीय परिवारों में चल रहे पीढीयों के संघर्ष रूढिवादी सोच वगैरह को दिखाती है। पर यह कहानी और उससे निकला नाटक मुख्य रूप से जिस नौकरी के सवाल की बात करता है ,उस पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है। हिंदी पट्टी में ऊंची जातियो मे सरकारी नौकरी की प्राप्ति अंतिम लक्ष्य की तरह मानी जाती रही है और उसमें भी अगर आई.ए.एस या आई.पी.एस हो तो वह तो जीते जी स्वर्ग मिलना हो गया। यह कहानी इस संबंध में अमरकांत की अमर कहानी  डिप्टी कलक्टर का भी स्मरण कराती है या कहीं अखिलेश की कहानी अगली शताब्दी के प्यार की रिहर्सल की भी याद दिलाती है।  कहानी में भी युवक और उसके परिवार का ध्यान सरकारी नौकरी पर है।
 हम केवल अंग्रेजों के भौगोलिक उपनिवेश नहीं थे बल्कि हमारी सोच को उन्होंने  सिंगल डायमेंशनल बना डाला। हमारे ही आसपास उपस्थित हजारो संभावनाओं और अवसरो को हम देख नहीं पाते ।   मैं एक बार बहुत पहले आजादी के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के बारे मे एक कार्यक्रम सुन रहा था । उसमें एक बात पर बहुत जोर दिया गया था वह यह था कि उन लाखों शरणार्थियों ने  कभी भीख नहीं मांगी। सब्जी बेचीस्कूटर ठीक करने की दुकान कर लीकिसी तथाकथित छोटे काम से नहीं घबराए । आज साउथ एक्सग्रेटर कैलाशजनकपुरीराजीरी गार्डन,  पटेल नगर सब उन्ही लोगों के बसाए हुए समृद्द इलाके हैं।  कहानी में युवक का किसी लाला के पास नौकरी करना अपनी क्षमता और प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करना माना जाता है और फिर तो सरकारी नौकरी मिलने के दो ही रास्ते दिखाई देते हैं।   खुराना नामक किसी पात्र को नौकरी पाने के लिए रिश्वत दी जाए। या फिर जैसाकि नाटक के क्लाईमैंक्स में भी कोई और रास्ता ना दिखने पर पिता यह सोचता है कि रिटायरमेट से पहले क्यों ना मेरी मृत्यु हो जाए जिससे कम्पैशनेट आधार पर ही चाहे बेटे को नौकरी मिल जाए। यह उस एक व्यक्ति की नहीं पूरे समाज की आत्महंता औपनैवेशिक सोच का परिचायक है। एक बार मुझे सी.बी.आई के मामले मे सरकारी तौर पर शामिल होने का मौका मिला था । अगर इस मामले की अति देखनी हो तो मंडल कमीशन के खिलाफ ऊंची जातियों के युवको के विरोध को याद कर सकते हैं। अपने आप को आग लगाते युवकों के विज्युल 30 साल बाद भी हम सबकी स्मृतियों में जीवंत हैं। काफी हद तक मंडल कमीशन इस मामले में गेम चेंजर था उसीके बाद हिंदी पट्टी की ऊंची जातियो का सरकारी नौकरियों को लेकर मोहभंग हुआ। हिदी भाषी समाज के नौकरियो के प्रति इस अंध मोह को यह कहानी और यह प्रस्तुति उसमे निहित तमाम विडंबनाओं और विद्रूपता के साथ प्रस्तुत करती है।

अलका सिन्हा ने भी अपनी कहानी मे एक सकारात्मक अंत दिखाया है जिसमे वह युवक सरकारी नौकरी या नौकरी की आस छोड ट्युशन सेंटर खोलने का निर्णय लेता है। यह एक सार्थक बदलाव का प्रतीक है जिस पर जितना बल कहानी में दिया गय था उतना नाटक में भी आता तो और अच्छा लगता । बेटे के नौकरी ना मिलने पर   पिता का आत्महत्या का प्रयास क्लाईमैक्स के लिए एक नाटकीयता तो देता हैपरंतु कहानी का मूल आशय हिदी भाषी समाज के अवचेतन मे नौकरियों को लेकर बनी जुगुप्सा से दो – चार करना है। युवाओँ के जीवन और कैरियर से जुड़े ज्वलंत सवालों को केंद्र में लाने के लिए अलका सिन्हा की कहानी चौराहा ऐसे कहानियों मे एक महत्वपूर्ण और सम्मानजनक स्थान रखती है। अगर उनकी चर्चित कहानी मोल्डिंग मशीन को च्रर्चा में जोड़ दिया जाए तो कहा  अलका सिन्हा अपने समय समाज और विशेषकर युवाओं की आशाओ अपेक्षाओ की दुनिया को ईमानदारी से खंगालती दिखाई देती हैं।
जहां तक कहानी के नाटकीय प्रस्तुतिकरण की बात है। नवीन अग्रवाल का अभिनय  आनुपातिक था बेहद संतुलित  न वहां संवेदना का अभाव है और ना ही सेंवेदना कोरी भावुकता में तब्दील हुई है। परंतु अपने पिता की आत्महत्या के प्रयास के लिए स्वयं को दोषी मानते हुए उसे स्वयं को बैल्ट से देर देर तक पीटना जैसे दृश्यों पर निर्देशक को  विचार करना चाहिए।   प्रेरणा अग्रवाल और भानु प्रकाश का अभिनय भी प्रशंसनीय था। सहयोगी टीम में पवन चक्रवर्ती  का सहयोग सराहनीय था।  कहानी में रोचकता और समग्रता प्रस्तुत करने के लिए नाट्य रूपांतरण मे भानुप्रकाश की प्रेमिका प्रभा जो उसके नौकरी ना मिलने पर किसी और से विवाह कर लेती है या खुराना जो पैसे लेकर नौकरी दिलवाने का वायदा करता है जैसे किरदारो को जोड़ा जा सकता है और विस्तार दिया जा सकता है। इस प्रस्तुति के लिए विशेष प्रशंसा श्री विनयशील और सोच संस्था को करनी होगी जो हिंदी के उत्कृष्ट साहित्य को नाट्य रूप मे प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्द है और जिसने मंटो की कहानियों और  श्री बी.एल.गौड की ’ मीठी ईद के बाद अलका सिन्हा की कहानी चौराहा के नाट्य रूपांतरण को परीक्षा के रूप में प्रस्तुत करने का अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। 

रविवार, 22 जुलाई 2018

'प्रवासी लेखन: नयी ज़मीन , नया आसमान' से ऐसा लगा ग्रेजुएट हो गया है प्रवासी लेखन

'प्रवासी लेखन: नयी ज़मीन , नया आसमान' से ऐसा लगा ग्रेजुएट हो गया है प्रवासी लेखन
                                                                             डॉ सुषम बेदी           
                                एमरेटस प्रोफेसर , कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयार्क





प्रवासी साहित्य को लेकर ज्यादातर विश्वविद्यालयों के छात्रों की शोध मे रुचि तो अकसर सुन जाती थी पर उसे लेकर स्वतंत्र पुस्तक की रचना के बारे में नहीं सुना था. हां कुछेक लेख जरूर देखने को मिले पर लगता है किसी भी हिंदी लेखक को वह इस लायक नहीं लगा कि उस पर पूरा एक ग्रंथ लिखा जा सके.  तभी जब अनिल जी ने कुछ शब्द लिखने के लिये अपनी पुस्तक "प्रवासी साहित्य: नई जमीन, नया आसमान " के अंश भेजे तो लगा कि अब प्रवासी लेखन बाकायदा सारी कक्षायें पास करके ग्रेजुएट हो गया है. अब उसे भी एक पढेलिखे साहित्य समाज के सम्मानित सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है.  यूं सच मे इस साहित्य की यात्रा बेहद कठिन रही है.  देखा जाये तो यह बहुत कुछ २१वी सदी का ही फिनामना है.  मुझे याद है अाठवें  दशक के अंत अौर नवें दशक में जब मेरी कहानियां हिंदी की मुख्य पत्रिकाअों(धर्मयुग, सारिका, हंस, साप्ताहिक हिंदुस्तान, वागर्थ अदि) में छप रही थीं तो पाठकों का ध्यान तो जरूर उन पर जाता था, मुझे हर कहानी पर िहंदुस्तान के अलग अलग शहरों से ढेर सारी प्रशंसात्मक चिट्ठियां भी मिला करती थी अौर १९८८-८९ में जब कमलेश्वरजी ने गंगा मे मेरे उपन्यास "हवन" को धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया तो उसके विषय की नवीनता को लेकर उन्होंने उसे नयी जमीन तोडनेवाला उपन्यास कहा.  हवन की चरचा खूब हुई फिर भी किसी ने मुझे प्रवासी उपन्यासकार नहीं कहा.  मजेदार बात है कि सबसे पहले जब "हवन"१९९३ मे अंग्रेजी मे "द फायर सेक्रेफाइस" नाम से इंगलैंड से छपा वहां मुझे अमरीका मे रहनेवाली हिंदी कथाकार, यानि कि एक डायसपोरा हिंदी लेखिका के रूप मे देखा गया--ये मेरी नयी पहचान थी, मेरे लिये  नयी.  मैं तब भी खुद को हिंदी की, भारत की कथाकार ही मानती थी, मेरी नागरिकता भी भारत की थी.   हवन के उपर लिखे गये  श्री के। बी।एल पाडेय अौर पुष्पपाल सिंह जी के समीक्षात्मक लेखों मे मेरी गिनती उषा प्रियंवदा, निर्मल वर्मा, महेन्द्र भल्ला अादि भारत से बाहर रहकर लिखने वालों मे की गयी पर ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं किया गया कि मैं प्रवासी लेखिका हूं.  फिर पता नहीं कब यह मुहिम चल पडा कि प्रवासी साहित्य को मान्यता मिलने चाहिये. मुझे अपना इस तरह कहलाया जाना अच्छा नहीं लगा था.  पर मेरे लिये अहमियत मेरे लेखन की ही रही. कोई क्या कहता है इस पर कभी गौर नहीं किया.  मैं हमेशा शमशेरबहादुर जी की कविता के शब्दों मे कहती रही अौर अाज भी कहती हूं-"बात बोलेगी, हम नहीं, भेद खोलेगी, बात ही."

मेरा इंगलैड जाना होता रहता है. लंदन का भी खास अाकर्षण है.  फिर वहां हिंदीवाले भी खूब मिले तो अाकर्षण अौर बढ गया.  हर ट्रिप मे नेहरु सेंटर मे दिव्या माथुर से जरूर मुलाकात होती थी.  वहां हिंदी साहित्य की सरगर्मी खूब थी.  धीरे धीरे दिव्या के ही जरिये दूसरे लेखकों से भी मुलाकात हुई.  २००४-५ में मुझे अपने पति के साथ लंदन में महीना महीना बिताने का मौका मिला. तभी मुलाकात हुई थी अनिल जोशी जी से.  उन दिनों तो सचमुच हिंदी की खूब हलचल थी, कवि सम्मेलन, कहानी पाठ, कुछ न कुछ होता रहात. सिरफ लंदन ही नहीं, बर्मिंघम.  यार्क मे महेन्द्र वरमा जी अौर उषा वरमा ने मुझे कहानी की वर्कशाप देने के लिये बुलाया था.  बरमिंघम भी गयी भाषण के लिये. लंदन के सारे लेखकों से मिली. तेजेन्द्र शर्मा का कथा यूके भी जोर पर था. उनकी संस्था मे भी कहानी पाठ किया. उषा राजे से भी लंबी बातचीत.  इस तरह इंगलैंड के साहित्यिक  माहौल से मैं बहुत प्रभावित हुई थी.  यूं मैं न्यूयार्क मे कहानी गोष्ठी करती रहती हूं पर लगा कि यहां वैसा साहित्यिक माहौल नहीं बन पाया जैसा इंगलैंड मे है.  खुद ही इस का जवाब यह भी देकर खुद को बहला लिया कि यहां सब बहुत दूर दूर है. कार से जाने के बजाय हवाईजहाज पर ही निर्भर करना पडता है , तभी बुलाअो तो भी कोई नहीं अाता.
कहने का तात्पर्य यह है कि इंगलैंड से ही कहीं प्रवासी साहित्य का कारवां निकला अौर हिंदी साहित्य के अासमान में गुबार की तरह फैल गया.  हर तरह समर्थन हुए अौर विरोध भी. अनिलजी चूंकि इगलैंड मे पोस्टेड थै, उन्होने प्रवासी लेखकों का संघर्ष देखा अौर वे भी उस संघर्ष में जुड गये. मुझे याद है कि २००६ जनवरी में जब मैं भारत मे थी तो वे दिल्ली मे पोस्ट हो चुके थै अौर वहां भी उनकी प्रवासी साहित्य की स्थापना की लडाई चलती रही. साहित्य अकादमी में उन्होंने प्रवासी साहित्य सम्मेलन का अायोजन किया था जिसमे िहंदी साहित्य के विद्वानों को इस साहित्य पर बोलने के लिये बुलाया गया था. रामदरश मिश्र भी वहां थे. रोहिणी अग्रवाल मे मेरे उपन्यासो पर बात की थी.  तब किसी ने यह सवाल उठाया कि चूंकि प्रवासी अहिंदी भाषी देशों मे बैठकर हिंदि मे लिख रहे है तो उनके साथ रियायत की जाय. जिसका मैंने डटकर विरोध किया िक अगर प्रवासी साहित्य अपने पैरो पर खडा नहीं हो सकता तो मरने दीजिये उसे.  अौर देखिये खडा हो ही गया.  बाकायदा स्वस्थ युवक या युवती, किसी का सहारा नहीं चाहिये उसे.  अपने बूते जियेगा, फलेगा, फूलेगा.  देखा जाय तो कभी कभी यह भी लगता है कि जिस तरक अमरीका अौर इंगलैड -रिटर्न्ड भारतीयो को भारत में यूं ही महत्व मिल जाता है वैसा ही कहीं इस साहित्य के साथ भी न हो रहा हो. पश्चिम की, दौलत की चमक अंा,खे चुंधिया तो देती ही है. खैर असलियत तो वक्त ही बताता है--क्या रहेगा, क्या बेमौत मारा जायेगा!
तो अब बात करे "प्रवासी साहित्य : नई जमीन, नया आसमान " कीा  अालोचना खंड खोला तो एक ही बैठक में पूरा का पूरा पढ डाला.  अनिलजी ने प्रवासी साहित्य को लेकर समय समय पर उठे सभी सवालों को अपनी कलम में समेट लिया है.   यहां तक कि प्रवासी नाम को लेकर भी लंबी चरचा की है कि प्रवासि लेखको ने ही पहले नाम बनाने के लिये शोर मचाया अौर जब नाम बन गया तो ये रोना रोने लगे कि हमें मुख्यधारा में क्यों नहीं मानते, प्रवासी कह कर अलग क्यो कर दिया, दोयम दरजे पर धर दिया.  विवाद सारा का सारा पढने मे दिलचस्प है.  यूं मै खुद इससे बाहर ही रही सो ज्यादा कह नहीं सकती. यह सब भारत अौर इंगलैंड के बीच ही हुअा.  अनिलजी चूंकि खुद लंदन के प्रवासी दृश्य का हिस्सा रहे हैं सो उन्होने ब्रिटेन के लेखकों की विशेष चरचा की है, उन्ही की पुस्तकों की समीक्षायें है पर खास बात यह है कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया है केवल इंगलैंड अमरीका के लेखक ही प्रवासी साहित्यकारों की श्रेणी मे नहीं है, मौरिशस, फिजी इत्यादि के हिंदी लेखको को भी हिंदी साहित्य जगत में पूरा स्थान मिलना चाहिये.  
पूरी पुस्तक सात खंडो मे बंटी है.  सरोकार खंड में प्रवासियो के सरोकार है , साक्षात्कार खंड मे कुछ लेखकों से साक्षात्कार है, कहानी अौर कविता के अलग अलग खंड है.  सरोकार खंड मे अगर प्रवासी लेखकों के कथ्य में किस तरह के सवाल अौर सरोकार उभरे हैं इसकी चरचा होती तो अच्छा रहता.  मूलत: यह ग्रंथ समय समय पर प्रवासी साहित्य के अलग अलग मुद्दों पर जो लेख अनिल शर्मा लिखते रहे हैं, उन्ही को व्यवस्थित, संयोजित करके प्रस्तुत किया गया है. पुस्तक खूब पठनीय है. जिस जिस हिस्से को भी मैंने पढने के लिये उठाया, बडे अाराम से झटपट पढ गयी.  अनिल जी को सराहती हूं कि अपनी व्यस्त सरकारी नौकरी को निभाते हुए भी वे प्रवासी साहित्य से इतने सालों से जुडे रहे, उसके मुद्दो पर सोचते रहे, लिखते रहे अौर अाज उनकी सालों की मेहनत "प्रवासी साहित्य: नई जमीन, नया आसमान" के अाकार मे हमारे सामने है.
सुषम बेदी

शनिवार, 14 जुलाई 2018

'प्रवासी लेखन : नयी जमीन, नया आसमान' - प्रवासी समाज, भाषा और संस्कृति जैसे मुद्दों की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल - डॉ कमल किशोर गोयनका



डॉ कमल किशोर गोयनका, उपाध्यक्ष , केंद्रीय हिंदी संस्थान


अनिल जोशी से मेरा संबंध / संपर्क तीन दशक पुराना तो है ही। अनिल दिल्ली में साहित्यिक गतिविधियों के निष्ठावान आयोजक तथा काफी बड़ी संख्या में लेखकों को साथ लेकर चलने में सक्षम रचनाकार हैं। अनिल के जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा साहित्य, संस्कृति, भाषा, राष्ट्र और राष्ट्रीयता के प्रश्नों और उनके उत्तरों को तलाशने में व्यतीत हुआ है और साथ ही  इंग्लैंड, फीजी आदि देशों में भारतीय उच्चायोग में हिंदी अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए हिंदी भाषा और साहित्य के विकास का महत्वपूर्ण कार्य भी किया है। मैंने कई बार महसूस किया है कि अनिल जोशी स्वयं में एक संस्था हैं और वे भारतीय संस्कृति एवं अस्मिता तथा राष्ट्र बोध के लिए समर्पित होकर कई पीढ़ियों को साथ लेकर चलने में सिद्धहस्त हैं। उन्होंने 'अक्षरम्' संस्था की स्थापना करके तथा उसकी निरन्तर होने वाली गतिविधियों से अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है और अब फीजी में भारतीय उच्चायोग में रहते हुए वे हिंदी भाषा व साहित्य तथा भारतीय संस्कृति के प्रचार - प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। अनिल जोशी ने काफी लिखा है और प्रवासी साहित्य पर उनके आलोचनात्मक लेखन से वे विशेषज्ञ की स्थिति तक पहुँच गये हैं। हिंदी में हमें अनिल जोशी जैसे  समर्पित,  निष्ठावान तथा निरन्तर कर्मशीलता वाले लेखक-आलोचक चाहिए जो हिंदी को राष्ट्रभाषा तथा वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए जीवन अर्पित कर दें। 
प्रस्तुत पुस्तक के सरोकार खण्ड में प्रवासी समाज, भाषा और संस्कृति जैसे मुद्दों की गहरी आलोचनात्मक पड़ताल है। इस खण्ड की विशेषता वह संवेदनशीलता है जिसके साथ इन प्रश्नों को उठाया गया है। उदाहरण के लिए विदेश में मृत्यु होने पर चिता जलान े की अनुमति देने की बात , या भारत से बाहर ़डिप्रेशन होेने के कारणों की जांच - पड़ताल , प्रवासी दिवस में निवेश संबंधी चिंता की चकाचोंध में भाषा और संस्कृति को केंद्र में रखने के प्रयास पर जोर देना या प्रमुख प्रवासी लेखकों या रचनाओं पर एक आत्मीय संवेदनशीलता से विचार का प्रयास । सब लेख यह सिद्द करते हैं  कि प्रवासी समाज, भाषा , साहित्य और संस्कृति के साथ उन्होंने गहरा तादातम्य विकसित किया है। उनका हाथ प्रवासी समाज के नब्ज पर है और इनमें प्रवासी समाज की सोच, संवेदना, सरोकार बखूबी व्यक्त हुए हैं। 

वे स्वयं कवि हैं और प्रवासी कविता पर उनकी गहरी पकड़ है। ब्रिटेन में रहकर उन्होंने ब्रिटेन के 23 कवियों की कविताओं का संकलन ‘धरती एक पुल’ प्रकाशित किया था। पश्चिम में रहने वाले हिंदी कवियों की यह प्रतिनिधि पुस्तक है ।  पुस्तक भारतीय मूल के पश्चिम में रहने वाले कवियों की कविताओं की आलोचनात्मक पड़ताल करती है पर उसके औजार भारत के आलोचना शाश्त्र से नहीं निकले हैं, बल्कि पश्चिम के हवा -पानी में विकसित हुए भारतीय बीजों की विशिष्ट सुगंध को आंकते समय व्यापक और उदार दृष्टिकोण को आधार बनाया गया  है। यह दृष्टि  उन्हें  ब्रिटेन के लंबे प्रवास और डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव, मोहन राणा , दिव्या माथुर , सुषम बेदी, पद्मेश गुप्त, गौतम सचदेव, अचला शर्मा जैसे लेखकों के साथ साहित्यिक संसर्ग से मिली। कविता के शाश्वत तत्व को चिन्हने की क्षमता , उसके शिल्प की सुघड़ता का निश्चय , समकालीन संदर्भों से उसका जुड़ाव और समग्र रूप से उसका मूल्यांकन उनकी आलोचनात्मक क्षमता को एक विशिष्ट धरातल देता है।

कहानी, पुस्तकों ,उपन्यासों, व्यक्तियों पर बातचीत से एक मुकम्मल चित्र बनता है। हम प्रवासी रचनाकारों को , उनके सरोकारों को , उनकी व्यक्तित्व की और रचना कर्म की संरचना , उसकी जटिलताओं , उसके संदर्भ , उसकी बुनावट, उस के खास किस्म के शिल्प , उसकी  विशिष्टताओं को समझ सकते हैं। यह आकलन, मूल्यांकन ,यह प्रस्तुति सबके बस की बात नहीं , इसके लिए प्रवासी मन की विशेष बुनावट को समझना पड़ता है। अनिल जोशी के लंदन  के पाचं साल के कार्यकाल और प्रवासी टुडे और अक्षरम के कारण प्रवासियों से व्यापक और अंतरंग संपर्क और फीजी के प्रवास  ने एक विशिष्ट किस्म की अंतरदृष्टि दी । यह व्यापकता और गहराई इस पूरे लेखन में दिखाई देती है। ब्रिटेन, युरोप, अमेरिका , कनाडा , मध्यपूर्व, फीजी , आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड  में रहने वाला शायद कोई प्रमुख साहित्यकार हो जिससे अनिल व्यक्तिगत रूप से परिचित ना  हों। युरोप, अमेरिका, कनाडा आदि के साहित्यकारों का ऐसा विशद और गहरा मूल्यांकन आलोचना की पुस्तक के रूप में शायद ही कहीं उपलब्ध हो। 

इस संकलन की विशेष उपलब्धि कहानी खण्ड है। प्रवासी लेखन की श्रेष्ठ चुनी हुई कहानियों का ऐसा विश्लेषण शायद ही कहीं उपलब्ध हो। इन कहानियों के माध्यम से प्रवासी जीवन के विविध पक्षों का जैसा सांगोपांग विश्लेषण किया गया है, वह दुर्लभ है। मजेदार बात यह है कि वह अपने आप में आलोचनात्मक लेखन से अधिक रचनात्मक लेखन लगता है। जैसे कहानी की कहानी कही जा रही हो। आलोचना और कहानी गुंथी हुई। प्रतिनिधि संवाद और कहानी की संरचना पर परत -दर -परत बात। इऩ आलोचनाओं के माध्यम से वे  प्रवासी कहानियों को समझने के लिए आवश्यक टैम्पलैट देते हैं। इन कहानियों का चयन ही उऩकी असाधारण दृष्टि को रेखांकत करता है।
अनिल की एक और विशेषता जटिल और विवादास्पद विषयों पर बचने की प्रवृत्ति के बजाए , बड़े साहस, तर्को और तथ्यों, वस्तुनिष्ठता  के साथ अपनी बात रखना है। पिछले कुछ वर्षो में प्रवासी साहित्य को प्रवासी साहित्य कहें या ना कहें को लेकर जो विवाद उत्पन्न हुआ , उस संबंध में  हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘हरिगंधा’ में प्रकाशित लेख उनकी शोधपरक प्रवत्ति , विचारों की तीक्ष्णता ,  विश्व साहित्य और प्रवासी साहित्य के विशद अध्य्यन की जानकारी देता है। यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि इस लेख के बाद इस पूरी बहस को एक दिशा मिली और नकारात्मक प्रवृत्तियों को एक विराम मिला । यह लेख उनकी सशक्त लेखनी का प्रमाण है कि उनमें विचार प्रवाह की दिशा को समझने और मोड़ने की शक्ति है। अन्य आलोचनात्मक लेख भी प्रवासी साहित्य से व्यापक घनिष्ट संपर्क का परिचय देते हैं। 



एक लेखक के साथ -साथ अनिल एक विचारक , चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, देश -विदेश में हिंदी का प्रचार - प्रसार इनका जुनून है। युरोप में स्थापित हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता इनकी दृ्ष्टि और निरंतर सक्रियता का एक प्रमाण है। इसी तरह अक्षरम के अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों के माध्यम से विश्व भर में हिंदी के प्रचार - प्रसार का प्रयास इनकी सक्रियता की उपज थी। पहले ब्रिटेन और अब फीजी में व 2005-2015 तक  विश्वभर के सक्रिय हिंदी कर्मियों के साथ जुड़ाव से इन्होंने एक विश्व दृष्टि विकसित की है , एक कार्य योजना का खाका खींचा है, कुछ व्यावहारिक कार्यक्रम सोचे हैं और क्रियान्वित किए हैं। यह सोच, यह विजन , यह अनुभव विश्व भर में हिंदी प्रेमियों के लिए एक स्फूरण का काम कर सकता है। वैश्विक स्तर पर ऐसे कुछ लोगों की सक्रियता से वैश्विक हिंदी का स्वरूप करवट ले सकता है। यह पुस्तक उनके इस संबंध में विचारों की प्रस्तुति करते हैं। इन विचारों में आग है, आशावादिता है, संकल्प हैं, परिपक्वता है और एक व्यापक जीवनदृष्टि है । 



कुल मिलाकर यह संकलन प्रवासी साहित्य का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज और वर्तमान प्रवासी रचनाकार और उनकी रचनाओं पर एक सार्थक, रचनात्मक गंभीर टिप्पणी है, जो प्रवासी विमर्श का रास्ता खोलेगी, रचनाओं और रचनाकारों पर एक बहस की शुरूआत करेगी , व्यक्तियों, पुस्तकों और रचनाओं को देखने के लिए एक रचनात्मक नजरिया देगी जो संकुचित नहीं है, व्यापक है, जिसमें भारतीय जीवन दृष्टि और मूल्य तो हैं ही पश्चिम की  मूल्य प्रणाली की भी गहरी समझ शामिल है । यही चीज उनके रचनाकर्म को और पुस्तक को विशिष्ट बनाती है। पुस्तक को मेरी बहुत शुभकामनाएँ।