बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

गिरमिट प्रथा की समाप्ति - भारत का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम



सरकार कुछ भी कहे , इस देश में सब यह समझते हैं कि यह प्रथा  सरकार की सहमति और भागीदारी के बिना  कभी की समाप्त हो गई होती। इस समय भारत ही एक ऐसा देश है जहां से गिरमिट मजदूर जाते हैं, भारत को इस अपमान का भागीदार क्यों बनाया जा रहा है। भारत की  ंअंतरआत्मा  दुर्भाग्य से  बहुत दिनों से सो रही थी।  अब उसे इस समस्या की विराटता का अनुभव हुआ है। और मुझे कोई संदेह नहीं है कि वह अपने को अभिव्यक्त किए बिना चैन नहीं लेगी। मैं सरकार से कहूंगा कि हमारी भावनाओं की अवहेलना ना करें। ‘ गोपालकृष्ण गोखले , 4 मार्च , 1912 भारत की Imperial legislative Council में. 

भारत ने 1947 में आजादी प्राप्त की ।  यह माना जाता है  कि 1857 की क्रांति  भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था।  मेरे विचार से  लाखों भारतीयों को शर्तबंदी की प्रथा से निकालने वाला , उन्हें खुले आकाश के नीचे सांस लेने का अधिकार देने वाला, जंजीरों से मुक्त करने वाला, लाखो भारतीय अबलाओं को घिनौने जीवन से मुक्त करने वाला गिरमिट समाप्ति का आदेश देश का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम था। इससे भारत भौगिलिक रूप से तो  आजाद नहीं हुआ पर विदेशों मे रहने वाली लाखों भारतीय संतानों को अपनी इच्छानुसार जीवन व्यतीत करने का , स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर मिला । इस महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक उपलब्धि के शताब्दी समारोह  के अवसर पर इसके  विभिन्न आयामों और गिरमिट समाप्ति की यात्रा की चर्चा करना जरूरी है। 

यह वर्ष गिरमिट की समाप्ति का शताब्दी समारोह है। मार्च 2017 में औपचारिक रूप से गिरमिट प्रथा  समाप्त हुई थी।  इस अवसर को  सौ साल पूरे होने का आए ।   इस अवसर पर देश -विदेश में कई कार्यक्रम कई किए जा रहे हैं। फीजी में मजदूरों को लाने वाले  आखिरी जहाज सतलुज V के आने का शताब्दी समारोह 2016 में धूम-घाम से मनाया गया । इसी प्रकार हाल में ही फीजी में गिरमिट  शताब्दी समारोह के चलते एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें देश -विदेश के विद्वानों / लेखकों ने भाग लिया  । इसी कड़ी में त्रिनिडाड में भी एक सम्मेलन आयोजित किया गया है । इसी तरह भारत में भी प्रवासी भारतीयों की संस्था अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद की ओर से एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इन सब कार्यक्रमों का क्या महत्व है? शताब्दी समारोह हो ना हो क्या फर्क पड़ता है? यह कौन सा डायसपोरा है ?  इस प्रथा के समाप्त करने के लिए किन महापुरूषों ने काम किया ? लाखों भारतीयों के जीवन को नर्क बनाने वाली इस प्रथा का खत्म होने क्यों जरूरी था और कैसे खत्म हुई ? यह संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे क्या महत्व रखता है। इन सब प्रश्नों पर इस लेख में विचार किया गया है। 

लाखों भारतीयों को गुलामी में ठेलने वाले , कोड़ो और जूतों की मार खिलाने वाली , महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाली,  भारतीयों के किसी प्रतिकार को अपराध कह जेल में ठेलने वाली ,  हजारों भारतीयों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली , अमानवीयता की इस घिनौनी दास्तान को समाप्त करने में महात्मा गांधी के साथ गोपाल कृष्ण गोखले, पं मदन मोहन मालवीय, रविन्द्र नाथ टैगोर,   सी.एफ. एंड्र्यूस , सरोजनी नायडू , बनारसी दास चतुर्वेदी ,  और तोताराम सनाढ्य  जैसे लोगों के भागीरथ प्रयत्न  रहे हैं।  भारतीय  अस्मिता के इस संघर्ष और भारतीय पुनर्जागरण के इस शंखनाद की इस यात्रा को समझना बहुत जरूरी है। 

प्रवासी भारतीयों का यह सौभाग्य था कि गांधी जी एक प्रवासी के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए और उन्हें प्रवासी भारतीयों के जीवन को निकट से देखने का , उनके कष्टों और प्रताड़नाओ में सहभागी बनने का , उनके संघर्षों की अगुआई करने का मौका मिला । बैरिस्टर होने के कारण अंग्रेजी भाषा और कानून पर उनकी पकड़ थी । उनकी नेतृत्व क्षमता ऐसी थी की बीसवीं शताब्दी में उनसे बड़ा कोई नेता नहीं माना जाता । उनकी संघर्ष यात्रा की भूमि दक्षिण अफ्रीका बना जहां उन्होंने , रंगभेद और गिरमिट के नाम पर गुलामी के संघर्ष का नेतृत्व किया । उन्हें पता था कि ट्रांसवाल और नेटाल की यह लड़ाई दक्षिण अफ्रीका की भूमि पर नहीं लड़ी जाएगी। 1896 में पहली बार गांधी जी ने भारत में आकर कांग्रेस के अधिवेशन में यह मुद्दा उठाया । इसको राष्ट्रीय और अंतर्राष्टॅीय विस्तार दिया । धीरे -धीरे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गिरमिट की समाप्ति का मुद्दा एक बड़े प्रश्न के रूप में उभरा । 

फीजी की कहानी इस पूरे परिदृश्य में विशेष है । फीजी को गिरमिट प्रथा की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लाने का काम मुख्य रूप से श्री तोताराम सनाढ्य ने किया।  उत्तरप्रदेश के इस निर्धन और अर्धशिक्षित व्यक्ति ने स्वयं गिरमिट के पांच साल काटे थे। आरकाटियों की चालों का शिकार बन इनकी भर्ती हुई थी । कलकता में रोते -पीटते आदमी की कोई सुनवाई ना होने पर  जहाज में बैठा दिया गया। फीजी में जाकर इन्होंने  हर तरह के अत्याचार सहे पर पांच साल में गिरमिट समाप्त होने पर फीजी वासियों की भलाई और मुक्ति के लिए प्रयत्न किए । बेगुनाह भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों से रक्षा करने के लिए किसी बैरिस्टर को भेजने की प्रार्थना करते हुए  उन्होंने गांधी जी को पत्र लिखा -
 हम लोग फीजी में गोरे बैरिस्टरों से अनेक कष्ट पा रहे हैं। ये गोरे लोग हम पर नाना प्रकार के अत्याचार करते हैं और हमारे सैंकड़ों पौंड खा जाते हैं। यहां पर एक भारतवासी बैरिस्टर की बड़ी आवश्यकता है। श्रीमान एक प्रसिद्द देशभक्त हैं , अतएव आशा है कि आप हमारे ऊपर कृपा करके किसी भारतवासी बैरिस्टर को यहां भेजने का प्रबंध करेंगे। इस विदेश में आपके अतिरिक्त कोई सहारा नहीं है, गांधी जी ने जवाब में लिखा - 
श्रावण वदी 8 , सं 1967 
आपका खत मिला है। वहां के हिंदी भाईयों की दुख की कथा सुनके मैं दुखी होता हूँ। यहां से कोई बैरिस्टर भेजने का मौका नहीं है। भेजने जैसा कोई देखने में भी नहीं आता है। जो इजा परे उसका बयान मुझे भेजते रहना। मैॆं यह बात विलायत तक पहुंचा दूंगा। । 
स्टीमर की तकलीफ का ख्याल मुझे बारबार यहां आता है। यह सब बातों के लिेए वहां कोई अंग्रेजी पढ़ा हुआ स्वदेशाभिमानी आदमी होना चाहिए  मेरे ख्याल से आवेगा तो मैं भेजूंगा । 
आपके दूसरे खत की राह देखूँगा। 
मोहनदास करमचंद गांधी का यथायोग्य पहुँचे। 
गांधी जी ने यह पत्र हिदी में लिखा हैं। गांधी जी ने तोताराम जी से प्राप्त  पत्र को कई अखबारों में प्रकाशन के लिए दे दिया । बैरिस्टर मणिलाल ने पत्र को इंडियन ओपिनियन में पढ़ा। वे उस समय मारिशस में गिरमिटियों के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने गांधी जी के आदेश पर फीजी में आने का निर्णय किया । फीजी में आने पर उनका जबर्दस्त स्वागत हुआ । सैकड़ो लोग सड़कों पर उतर आए । फीजी आदिवासियों ने भी मणिलाल  का स्वागत किया । बैरिस्टर मणिलाल के आने से फीजी में नेतृत्वविहीन भारतीयों को नेतृत्व मिला । उनके तार गांंधी जी के दूत से जुड़ गए। भारतीयों का संगठन खड़ा हुआ । मणिलाल जी ने इंडियन सैटलेर नाम से एक अखबार भी निकालना शुरू किया । थोड़े दिन में मणिलाल इतने लोकप्रिय हो गए कि जब फीजी की संसद में  भारतीयों के प्रतिनिधित्व की बात आई तो मणिलाल जी के समर्थन में हजारों भारतीयों ने ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए । इस बीच ब्रिटीश सरकार ने गिरमिट प्रथा पर अध्य्यन के लिेए श्री मैकलीन और चिम्मनलाल की दो सदस्यीय कमेटी बनाई थी । यह कमेटी जब फीजी में आई तो गन्ना खेत के मालिकों ने मजदूरों को डराना -धमकाना शुरू किया था ।      तोताराम सनाढ्य ने एक घटना का उल्लेख किया है ‘ एक दिन क्या हुआ कि एक गोरे ओवरसियर ने एक भारतवासी को इतने घूंसे मारे कि उस के मुंह से खून गिरने लगा और उसके दो दांत भी टूट गए । उस दशा में दांतों को हाथ पर रख कर चिम्मनलाल जी के पास लाया और कुल हाल सुनाया । श्री चिम्मन लान जी ने उसे चिट्ठी देकर थाने में जाने को कहा । वह थाने को जा रहा था कि ओवरसियर साहब मिल गए और उन्होंने उसे खूब धमकाया और कहा सब्र करो चार दिन बाद चमनलाल चले जाएँगे, क्या चिम्मनलाल तुम्हारा बाप है? पांच साल के लिए हम तुम्हारा बाप है। कमीशन के जाने पर हम तुम्हारी सारी गर्मी निकाल देंगे, वह बेचारा इस धमकी में आ गया और चुप रह गया। ‘ दुख की बात है कि यह सब देखकर भी कमेटी ने गिरमिट को जारी रखने की सिफारिश की और मजदूरों के हाल में बेहतरी आई है , यह रिपोर्ट दी। यद्यपि इसके पश्चात सी.एफ. एड्रूयज और पीयरसन ने एक स्वतंत्र कमेटी के सदस्य के रूप में फीजी की यात्रा कर अपनी रिपोर्ट दी।

तोतााराम सनाढय इस बीच गिरमिट प्रथा के खिलाफ प्रचार करने के लिए भारत आ गए थे। उनकी मुलाकात प्रसिद्द पत्रकार बनारसी दास चतुर्वेदी से हुई । उन्होंने अपनी आपबीती श्री चतुर्वेदी को सुनाई । बनारसीदास जी के सहयोग से उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई , फीजी में मेरे 21 वर्ष , किताब भारतीय समाज को झकझोरने वाली साबित हुई। फीजी में बैरिस्टर मणिलाल को आमंत्रित कर , इंडियन एसोशिएशन की स्थापना कर , अपनी पुस्तक से हलचल मचाकर   तोताराम सनाढ्य ने जो काम किया है , उसके आधार पर उन्हें गिरमिट के खिलाफ फीजी के संघर्ष का अगुआ कहा जा सकता है। उन्होंने अपना शेष जीवन भी गांधी आश्रम में रहकर  सामाजिक कार्यंों मे बिता दिया  । तोताराम सनाढ़्य ने अपनी पुस्तक में कई और लेखों और पुस्तकों के संदर्भ दिए। जैसे उसी समय  एक और पुस्तक प्रकाशित हुई जिसके लेखक एक मिशनरी जे. ़डब्लयू .बर्टन थे , पुस्तक का नाम था Fiji of Today उस  पुस्तक में भी फीजी में भारतीयों की स्थिति  का दारूण चित्र है। इसी प्रकार  एक और महिला मिशनरी  कुमारी डडले जो फीजी रहकर आई थी , उनके लेखों े के अंशोों को भी तोताराम जी ने अपनी पुस्तक में   सम्मलित किया  । कुमारी डडले के  Modren Review में प्रकाशित अंश को उन्होंने प्रकाशित किया  । वे लिखती हैं-
‘ जब यह स्त्रियां डिपो पहुंच जाती हैं तो उनसे कहा जाता है कि जब तक तुम खाने का खर्च ना दोगी और दूसरी चीजों का खर्च ना दोगी तब तक तुम यहां से अपने घर नहीं जा सकती हैं। ये बेचारी कहां से दे सकती हैं। ये भीरू ह्रदय और डरपोक स्त्रियाां इस देश मे भेज दी जाती हैं और उन्हे यह भी नहीं मालूम होता है कि कहां भेज दी गई हैं। वे खेतों पर काम करने के लिए गूंगे जानवरों की तरह लगा दी जाती हैं। जो काम उन्हें दिया जाता है , यदि वे उसे ठीक तरह से नहीं करती हैं तो पीटी जाती हैं, उनपर जुर्माना होता है। यहां तक कि जेल भेज दी जाती हैं। खेतों पर काम करते -करते उनके चेहरे और हाव -भाव बदल जाते हैं। कुछ टूट जाती हैं, कुछ उदास हो जाती हैं, कुछ पीड़ीत , कुछ कठोर और डरावनी। उनके चेहरे मेरी नजरों में हमेशा घूमते रहते हैं। ‘ 

श्री जे.डब्लयू . बर्टन ने भी  अपनी पुस्तक Fiji of Today में दारूण कहानी का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं- 

‘ असभ्य और जवान ओवरसियर जोकि आस्टॅेलिया, न्यूजीलैंड के होते हैं, खूबसूरत हिंदूस्तानी स्त्रियों पर मनमाने अत्याचार करते हैं और अगर ये स्त्रियां मना करती हैं तो उन पर और उनके पति पर बहुत अत्याचार करते हैं। कभी -कभी दवाखाने के कंपाऊडर किसी भारतीय स्त्री को एक बंद कमरे में बुला लेते हैं और यह बहाना करते हैं कि आओ हम तुम्हारी डॉक्टरी परीक्षा करें, चाहे वह बेचारी विरोध करे और कहे कि मुझे कोई बीमारी नहीं , मैं नहीं जाना चाहती , पर तब भी बलात उसे कोठरी में ले जाते हैं फिर अपनी कामेच्छा पूरी करने के लिए अत्यंत असभ्यता के साथ उस पर पाशविक अत्याचार करते हैं अथवा उसे इसलिए तंग करते है कि वह एक ऐसे भारतवासी के विरूद्ध गवाही दे दे जिससे कि उनकी कुछ अनबन हो गई है। सुना गया है कि स्त्रियां वृक्षों में एक कतार से बाँध दी गई है और उनके छोटे-छोटे बच्चों के सामने उन पर कोड़े फटकारे गए हैं। ‘
वो आगे लिखते हैं‘ जिस स्थिति में भारतीय रह रहे हैं उसमें और गुलामी में ज़रा सा ही फर्क है। ज्यादातर कुली इसे साफ तौर पर नर्क कहते हैं। ….जब तक कंपनी का काम मजदूर लोग भली प्रकार से करते रहते हैं , तब तक कंपनी वालों को कोई फर्क नहीं पढ़ता । और यही बात कंपनी के खच्चरों और बैलों के संबंध में कही जा सकती है। ‘
‘अगर किसी आदमी में थोड़ी भी दया है तो उसके लिए सबसे कष्टदायक और दुख और विषाद से भरने वाली जगह कुली लेन है।’ 


इस बीच अपना सम्मान बचाने के लिए जान की बाजी लगाने वाली फीजी की   महिला कुंती की चारों तरफ चर्चा  हो रही थी । 
तोताराम सनाढ्य , सुश्री डडले, श्री जे. डब्लयू . बर्टन , एंड्रूयज कमेटी की रिपोर्ट ने भारतीय चेतना को झकझोर दिया । प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सुश्री सरोजनी नायडू ने इलाहबाद में मार्च 1916 में यह भाषण दिया -

‘मैं एक महिला हूँ , चाहे भारत की माँ - बहनों का अपमान देखकर आपकी आत्मा जाग्रत नहीं होती , पर मेरी होती है, स्त्री होने के नाते मेरे सम्मान पर कोई चोट करता है तो मुझे पीड़ा होती है। हमारे लिए सबसे गर्व की स्मृति वह है , जब सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई  और उसने धरती माता से प्रार्थना की वह धरती में समा जाना चाहती है और धरती माँ ने उसको अपनी गोद में ले लिया। मै उन महिलाओं की तरफ से बोलने के लिए आयी हूँ  जिसके सबसे गौरव का क्षण वह है जब चितौड़ की रानी पद्मनी ने अपने सम्मान के लिए चित्ता पर चढ़ जाना बेहतर समझा। मैें उन स्त्रियों की तरफ से बोलने के लिए आई हूँ जो मृत्यु के द्वार से अपने पति को वापिस खींच लाई । मूक प्यार से उसमें प्राण फूंक डाले। मैें ऐसी ही एक मारी गई स्त्री के नाम पर अपील करती हैं, जैसा Mr Andrew  ने बताया जिसके भाईयों ने उसका सतीत्व , परिवार और धर्म को अपना खून देकर बचाया।’

वर्ष 1912 में श्री गोपालकृष्ण गोखले ने गिरमिट की समाप्ति के लिए संसद में प्रस्ताव रखा । यह प्रस्ताव ऐतिहासिक माना जाता है और  इसे श्री गोपाल कृष्ण गोखले की भारतीय राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण देन माना जाता है। इस  प्रस्ताव में गिरमिट के सभी पक्षों को व्यवस्थित , प्रभावशाली रूप से तर्कों और तथ्यों के साथ रखा गया। यह प्रस्ताव दिल और दिमाग का सुंदर संयोजन है।  - 4 मार्च , 1912 को भारत की Imperial legislative Council में गिरमिट प्रथा समाप्त करने के लिए   रखे गए इस प्रस्ताव की मुख्य बातें निम्नलिखित थीं -

प्रस्ताव के प्रारंभ में श्री गोखले ने  गिरमिट की समाप्ति की अपील करने के छह कारण बताए- पहला, यह कि जो लोग इस प्रथा के अंतर्गत आते हैं, वह ऐसे दूर और अज्ञात जगह पर जाने के लिए हाँ करते हैं , जिसकी भाषा, संस्कृति , रीति  -रिवाज के बारे में उनको नहीं पता होता , ना ही उनका वहां कोई संबंधी व मित्र होता है , दूसरा - उनको ऐसे जमीन मालिक से बांध दिया जाता है , जो उन्हें नहीं जानता और ना वो उसे जानते हैंं , जिसको चुनने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। तीसरा - वो जमीन मालिक के स्थान को छोड़कर स्पेशल परमिट के बिना कहीं नहीं जा सकते , चौथा - उन्हें जो काम दिया जाएगा वह करना ही होगा। यह पांच साल के लिए उनपर अनिवार्य है उससे निकलने का उनके लिए कोई रास्ता नहीं है, पांचवां , वो ऐसे  वेतन पर काम करने के लिए तैयार होते हैं , जो उस क्षेत्र में काम करने वाला मुक्त मजदूर की तुलना में कम है, कई बार तो बहुत ही कम है, छठा,  उन्हें ऐसे कानून के अंतर्गत डाल दिया जाता है , जिसके बारे में उन्हें  देश छोड़ने से पहले बताया नहीं जाता , जो उस भाषा में है जिसकी उनको कोई जानकारी नहीं है। किसी छोटी सी बात पर उन्हें कड़े श्रम और जेल की सजा दी जा सकती है। यह धोखाधड़ी , अपराध की बात नहीं किसी छोटी सी बात पर जैसे जरा सी लापरवाही , कोई शब्द , कोई इशारा उन्हें दो -तीन महीने के लिए जेल में ले जा सकता है। 
उन्होंने अपनी बात रखते हुए जोर देकर कहा-

‘मैं यहां कहना चाहूँगा कि यह एक राक्षसी प्रणाली है, जो अपने आप में अन्यायपूर्ण है, जो धोखाधड़ी और ताकत के गलत प्रयोग पर आधारित है, जो न्याय और मानवीयता की वर्तमान भावनाओं के खिलाफ है और जो देश इसको सहता है उसकी सभ्यता पर गहरा कलंक है। ‘
उन्होंने गिरमिट प्रथा के  इतिहास की बात करते हुए कहा- 
गिरमिट प्रणाली के इतिहास पर नज़र डालें तो तीन बातें साफ नज़र आती हैं- पहला , गुलामी प्रथा का 1833 में समाप्त होने पर उसके विकल्प के रूप में 1834  में इस प्रथा को शुरू किया गया । दूसरा, इस प्रथा के अंतर्गत गुलामी प्रथा में काम करे गुलाम भी काम नहीं करना चाहते थे । तीसरा, शुरू से ही इसके अमानवीय पक्ष के कारण इतनी समस्याएं आई कि ब्रिटिश सरकार को भी इसे बार - बार बंद करना पड़ा क्योंकि इसके  खिलाफ बहुत शिकायतें थी । श्री गोखले ने यह सवाल भी उठाया कि जिसे Fair Contract  कहा जा रहा है , वह क्या है ?  उन्होंने कहा कि इसे Fair Contract कहना अंग्रेजी भाषा का अपमान है। यह ऐसा Contract  है जो ऐसे दो व्यक्तियों के बीच हो रहा है कि एक पक्ष अशिक्षित , भोला -भाला और साधनविहीन है और दूसरा शक्तिशाली । शक्तिशाली पक्ष यह भी सुनिश्चित करता है कि दूसरे पक्ष को यह भी पता ना चले कि इस Contract में क्या लिखा है। उसे यह नहीं बताया जाता कि इसमें काम ना करने , या कम करने पर दंड है,जुर्माना है। उन्होंने Protocter of Imigrants और मजिस्टॅेट को गिरमिटियों की सुरक्षा  के लिए होने की बात को मजाक बताया   । उन्होंने मारिशस के एक मजिस्ट्रेट Mr Coombs  का वक्तव्य पढ़ा जो यह कहते हैं ‘ कि हम कुलियों को यह बताते थे कि काम तो उनको करना ही है , अगर खेत में करोगे तो उसके पैसे मिलेंगे , वर्ना जेल में जाकर मुफ्त में काम करना पढ़ेगा। ‘उन्होंने त्रिनिडाड की एक घटना का उल्लेख किया  जिसमें एक गर्भवती मजदूर महिला के पेट पर लात मारने पर एक ओवरसियर पर सिर्फ 3 पोंड जुर्माना किया गया जबकि किसी साधारण सी  हुक्मउदूली पर मजदूरों को तीन महीने की जेल सुना दी गई।

उन्होंने 100 पुरूषों पर 40 महिलाओँ को भेजने को अनैतिकता की जड़ बताया और महिलाओं की करूण स्थिति के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होने गिरमिट मजदूरों की दशा का वर्णन करते हुए कहा कि  उनकी कहानी सुनकर कोई पत्थरदिल भी पिघल जाएगा। ऐसे भोले -भाले लोग जो अत्याचारों से तंग आकर चल देते हैं कि क्या पता समुद्र के बीच में से कोई जमीन का रास्ता हो जो उनके देश और गांव तक जाता हो!  रास्ते में उन्हें पकड़ कर सजा दी जाती है या जंगली जानवरों ने खा लेते हैं, या सर्दी - गर्मी और भूख से बदहाल होकर मर जाते  हैं।  श्री गोखले ने कहा इऩ गिरमिट मजदूरों की मृ्त्यु दर बहुत  अधिक है , बड़ी संख्या में आत्महत्याओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने पूछा कि वे क्या परिस्थितियां हैं जिसमें किसी व्यक्ति को अपना ही जीवन समाप्त करना पड़ता है!  
उन्होंने अंग्रेज सरकार के निष्पक्षता और इस सारे में कोई भूमिका नही होने की बात पर सवाल उठाए और पूछा कि यह सारी प्रणाली किस की मर्जी से चलती है  ? कौन भर्ती करने वालों को लाईसेंस देता है ? कौन मजिस्ट्रेट नियुक्त करता है ? 
उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा  ‘सरकार कुछ भी कहे , इस देश में सब यह समझते हैं कि यह प्रथा  सरकार की सहमति और भागीदारी के बिना  कभी की समाप्त हो गई होती। इस समय भारत ही एक ऐसा देश है जहां से गिरमिट मजदूर जाते हैं, भारत को इस अपमान का भागीदार क्यों बनाया जा रहा है। भारत की  ंअंतरआत्मा  दुर्भाग्य से  बहुत दिनों से सो रही थी।  अब उसे इस समस्या की विराटता का अनुभव हुआ है। और मुझे कोई संदेह नहीं है कि वह अपने को अभिव्यक्त किए बिना चैन नहीं लेगी। मैं सरकार से कहूंगा कि हमारी भावनाओं की अवहेलना ना करें। ‘ 
 यह प्रस्ताव बहुमत से अस्वीकृत हो गया । परंतु भारतीयों ने हार नहीं मानी और श्री मदन मोहन मालवीय ने 20 मार्च  1916  में गिरमिट प्रथा समाप्त करने संबंधी प्रस्ताव रखा । उन्होंने भर्ती करने वालों की धोखा - धड़ी और भोले -भाले लोगों को फसाने की  बात की । Contract के अन्यायपूर्ण होेने की बात की । विदेशों में उनके साथ आने वाली समस्याओं की बात की । इस संदर्भ में उन्होंने एंड्रयू और पीयरसन  की गैर -सरकारी   कमेटी की फीजी यात्रा का उल्लेख किया । स्वतंत्र रूप से फीजी गई एंड्रयूस  कमेटी लिखती है ‘  हम कुली लेन को पहली बार देखने के अऩुभव को नहीं भूल सकते । आदमियों और औरतों के चेहरे के भाव इस घोर पाप और अत्याचार की कहानी कह रहे थे। आसपास छोटे बच्चों को देखना तो स्थिति को और भी करूण बना देता है। एक खेत से दूसरे खेत जाते हुए निरंतर वही एक जैसा चेहरा और हाव-भाव । वही नैतिक रोग जो उनके दिल और दिमाग को खाए जा रहा था। —— ऐसा नहीं कि हमने अपने जीवन में विपत्ति और करूणा में पड़े लोगें को देखा नहीं पर फीजी में हमने जिन स्थितियों को देखा । वो हमारी सोच से बाहर थी। कुछ नई और ऐसी परिस्थिति जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। बेहिसाब पाप और अत्याचार की महामारी  से ग्रस्त पूरा समाज। ‘ विवाह की पवित्रता का यहां कोई मतलब नहीं है, … लड़कियां बेची और खरीदी जाती हैं। धार्मिक परंपरा से विवाह होने को कोई मान्यता नहीं है। भारत में आत्महत्या की दर जो दस लाख पर 45-65 थी वह वहां पर 926 है। एंड्रयूज कमेटी की रिपोर्ट से उल्लेख करते हुए श्री मालवीय ने  कहा कि क्या वजह है जितनी हत्याएं होती हैं , वे सब महिलाओं की होती हैं. और जितनी आत्महत्या होती हैं  , वह सब पुरूषो की होती है। उन्होंने कहा कि अब इस प्रथा की मरम्मत करने से काम नहीं चलेगा अब इसको जड़ से उखाड़ना पडे़गा। 

जिस संसद ने 2012 में गोखले के प्रस्ताव को अस्वीकार किया था , उसने अनमने मन से मालवीय जी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । प्रस्ताव की स्वीकृति की भाषा में आश्वासन तो था पर समयबद्धता नहीं थी 


 अक्तूबर , 1916 को मुंबई राज्य का कांग्रेस अधिवेशन बुलाया गया । इसके तीसरे दिन याने 23 अक्तूबर को गांधी जी ने अपने विचार हिंदी और गुजराती में रखे। उन्होंने लार्ड हार्डिंग के इस आधे -अधूरे आश्वासन को स्वीकार नहीं किया जिसमें कहा गया था कि वह महामहिम से विहित समय में In due course  गिरमिट प्रथा को समाप्त करने का आश्वासन ले लेंगे। 

गांधी जी ने अपने भाषण में कहा भारत आधे-अधूरे आश्वासन से संतुष्ट नहीं होगा, भारत ने अपनी लापरवाही से इस प्रणाली को लंबे समय तक सहा । अब समय आ गया है कि इस समस्या को हल करे। इसके लिए सफलता पूर्वक आंदोलन करेंगे। जनमत और प्रेस इसे तत्काल समाप्त करना चाहती है। यह मेरे द्वारा सत्याग्रह का विषय हो सकता है। अंतत : गांधी जी के सत्याग्रह और भारत में उभरते असंतोष को देखते हुए मार्च 2017 में गिरमिट प्रथा समाप्त की गई। 


संदर्भ -
  1. तोताराम सनाढ़्य - फीजी द्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष - मुद्रण - हनुमंत सिंह राजवंशी, राजपूत एंग्लो ओरियंटल प्रेस , आगरा, प्रकाशक , भारती भवन , फीरोजाबाद , यू.पी 
  2. एंड्रूयज .सी.एफ. और डब्लयू.डब्लयू पीयरसन, फीजी में शर्तबंदी मजदूरों पर रिपोर्ट , एक स्वतंत्र जांच, इलाहबाद, 1916
  3. महात्मा गांधी , समग्र , वाल्युम 1-100 , प्रकाशन विभाग , भारत सरकार, नई दिल्ली
  4. लेजिस्लेटिव विभाग की कार्यवाही, भारत 1912
  5. लेजिस्लेटिव विभाग की कार्यवाही , भारत 1916
  6. Indian Naionalist and Indentured Imigration and Labour . 2014, Nehru Museum and Library.
  7. Gokhle Finest hour: persuading the Briitish to abolish indenture. WWW. sablokcity.com
  8. Speeches of Madan Mohan Malviya , Malivyamission.
  9. Indenture system and Mahatama Gandhi - Dr Yogendera Yadav , gandhiking-ning.com
10. Mr J.E.Burton - Fiji of Today.
11. Ms Dudley - In Modren Economic Review
12. Dr Brij Lal - Chalo Jahaji, On a journey through Indenture in Fiji , Division of Pacific and Asian History, Australian National University, 2000

रविवार, 4 जून 2017

प्रवासी कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह - प्रवासी -पुत्र- डॉ पद्मेश गुप्त

प्रवासी कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह - प्रवासी -पुत्र- डॉ पद्मेश गुप्त 





कमलेश्वर, अशोक बाजपेयी , केशरी नाथ त्रिपाठी जी, बालकवि बैरागी, कन्हैया लाल नंदन, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, मनोहर श्याम जोशी, जावेद अख्तर , नरेंद्र कोहली, अशोक चक्रधर,  सबमें एक समानता क्या है? सबमें एक समानता यह  है कि  सबको पद्मेश गुप्त जी ने ब्रिटेन में आतिथ्य प्रदान किया   है। उनके लिए ब्रिटेन के हिंदी प्रेमियों से संपर्क बिंदु   पद्मेश बने। यहां  तक कि हिंदी साहित्य की बहुत सी बड़ी हस्तियों के तो वो परिवार का  अंग बन गए हैं। यह  कविता संग्रह पिछले बीस वर्षों के इस परिचय, आत्मीयता, जुड़ाव, हिंदी आंदोलन के प्रति गहरी निष्ठा , विरल व्यक्तित्वों के संसर्ग और पद्मेश जी की साधना का परिणाम है।

पद्मेश जी के संग्रह का प्रकाशन एक उत्सव है । यह उत्सव सिर्फ उनके लिए  व्यक्तिगत उत्सव नहीं है । यह ब्रिटेन के हिंदी साहित्य के लिए उत्सव है। यह ब्रिटेन में हिंदी के लिए उत्सव है । यह प्रवासी साहित्य और विदेशों में हिंदी भाषा  के लिए लिए एक उत्सव है। इस बात को  ठीक तरीके से समझने के लिेए हमें  उनके संग्रह के कुछ विशिष्ट कविताओं पर दृष्टि डालनी होगी।  यह कविताएं निम्न व्यक्तित्वों को समर्पित की गई हैं- ब्रिटेन में हिदी की जड़ जमाने वाले स्वर्गीय लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, ब्रिटेन में हिंदी के संरक्षक श्री केशरीनाथ त्रिपाठी, ब्रिटेन में हिंदी के प्रतिनिधि साहित्यकार रहे स्व. डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन में युवा पीढ़ी में हिदी की अलख जगाने वाले स्वर्गीय श्री वेद मोहला, हिंदी के प्रखर लेखक स्व. गौतम सचदेव, हिंदी के पुरोधा- प्राण शर्मा,  जाने -माने लेखक और बी.बी.सी से जु़ड़े वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेश भारतीय,  वातायन संस्था की संस्थापिका अध्यक्ष सुश्री दिव्या माथुर, कृति यू.के के श्री कें.के. श्रीवास्तव और सुश्री तितिक्षा  । ये वे प्रमुख  लोग हैं जिन्होंने ब्रिटेन में हिंदी की इमारत खड़ी करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और जिनसे पद्मेश जी के निकट ,आत्मीय और विशिष्ट संबंध हैं। 

 ब्रिटेन में हिंदी के प्रचार - प्रसार के सद्प्रयासों और इन व्यक्तित्वों के अभियानों और प्रयत्नों में बिना आशा और अपेक्षा के , कंधे से कंधा मिलाकर जो शख्स चला वह पद्मेश गुप्त था. जो सिंघवी जी के संदेश को लेकर नगर -नगर घूमा, जिसने त्रिपाठी जी के अंतर्राष्ट्रीय  कवि सम्मेलन की टेक को बरसों अपने कंधे पर चलाया। जिसने सत्येंद्र जी, गौतम जी, नरेश जी और दर्जनों लेखकों  को पूरबाई और प्रवासी टुडे का मंच दिया। जिसने अनिल शर्मा और  वेद मोहला के साथ हिंदी ज्ञान  प्रतियोगिता में बच्चों में हिंदी अभियान के लिेए संसाधन जुटाए और नेतृत्व दिया। जिसने वातायन और कृति यू.के की जड़ों को सींचा। जिसने ब्रिटेन के लेखकों को पूरबाई पत्रिका का मंच लगभग 15 से अधिक वर्षों तक दिया। पर  उनकी इस सक्रियता  का कविता से क्या संबंध ? संबंध यह है कि उनकी कविताएं हिंदी , भारत और भारतीयता  के प्रति कुछ करने की दीवानगी, असीम प्रतिबद्धता , प्रेरणादायी कर्मठता,  हंसते -हंसते काम करने की विशिष्टता , जहां कहीं कुछ सकारात्मक हो रहा है , वहां साथ खड़े रहने की लगन और जहां नकात्मक लोग या बातें हैं , वहां पतली गली से निकलने की समझ से निकली हैं। जहां कहीं हिंदी के लिए सकारात्मक हो रहा है उसके साथ निराकार, निराभिमान , बिना किसी अपेक्षा के कार्य करने का संकल्प उनके क्रिया- कलापों , गतिविधियों , साहित्य और  उनकी कविता के मूल में है। उनकी कविताओं को पढ़ना पिछले तीन दशक के ब्रिटेन में हिदी साहित्य के परिदृश्य की आत्मा ,प्रवाह और उसके अंतरविरोधों को समझना है। अगर व्यापक अर्थों में कहें तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को जानना  प्रवासी साहित्य और आंदोलन की मूल प्रेरणाओं को आत्मसात करना और उसके मर्म को समझना है। अगर प्रवासी साहित्य और उसके उद्भव और विकास पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि  1990 के दशक से   हिंदी के प्रतिभाशाली लेखकों की पौध ब्रिटेन से निकली । उसे मंच देने , पत्रिका  देने, प्रोत्साहन देने, खाद पानी और परिवेश देने का काम जिस शख्स ने सर्वाधिक किया वह पद्मेश गुप्त हें। इसलिए वे प्रवासी साहित्य आंदोलन के सूत्रधारों में से हैं। इसलिए इस संकलन का नाम प्रवासी -पुत्र सर्वथा उचित है। आइए उनके संग्रह की प्रमुख विशेषताओं पर विचार करते हैं। 

सबसे पहले उनके शीर्षक प्रवासी -पुत्र की बात करें, उन्होंने प्रवास में, प्रवासी, प्रवास की पीड़ा जैसा शीर्षक इस संग्रह को क्यों नहीं दिया ? अपने को प्रवासी - पुत्र क्यों कहा ? पुत्र की बात होते ही ,ऋग्वेद का सूक्त ध्यान आता है- माता भूमो: पुत्रों अहं पृथिव्या , यह भूमि माता है , और मैं उसका पुत्र है। यह माता - पुत्र का भाव भारत में ही है , बाकी काफी देशों में Fatherland शब्द का प्रयोग किया जाता है। भारत में भारत माता शब्द बहुत प्रचलित है और राष्ट्र की उसी प्रकार से कल्पना की गई है। यह पुत्र का भाव कर्तव्य का बोध पैदा करता है और बार-बार आकलन को प्रेरित करता है कि मैं जन्मभूमि के प्रति अपना देय  दे पा रहा हूं या नहीं! बूढ़े माता -पिता को दवाई नहीं दे पा सकना , चश्मा नहीं बनवाने के लिए उपलब्ध होना याने परिवार के दुख और परेशानी में शारिरिक रूप से उपलब्ध ना हो पाने का दर्द उनकी कविताओं में मौजूद है। प्रवास से संबंधित कविताओं में यह पुत्र भाव अविरल  मौजूद है । भारत माता के पुत्र के नाते भारतीय भाषाओं और संस्कृति के  पश्चिम में प्रचार - प्रसार के  निरंतर समर्पित भाव से उनके प्रयत्न रहे हैं। वह दायित्व , वह देय , वह जिम्मेदारी जिसे उन्होंने सदा महसूस किया है , निरंतर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रकट होती है । वही इस शीर्षक का कारक भी है। 
परंतु मजेदार बात यह है कि इन कविताओं की कालावधि 25-30 साल होने के कारण संग्रह में कवि के रूप में उनका विकास और प्रवास से जुड़ी विभिन्न मन: स्थितियां , परिप्रेक्ष्य, विडबंनाएं उभर कर आई हैं जो कवि के रूप में उनके विकास को भी प्रदर्शित करती है और प्रवासी - पुत्र को मोनोटोनस और स्टीरियो - टाईप संकलन  होने से बचाती है। 

अब यह देखा जाए कि दुनिया भर के प्रवासी रचनाकारों को मंच देने वाले पद्मेश गुप्त कि स्वयं की प्रवासी कविताएं क्या कहती हैं। वे अपने आपको प्रवासी -पुत्र क्यों कहते हैं? उनकी कविताओं में प्रवास की पीड़ा है , विस्थापन का दर्द है, रिश्तों की दरकती जमीन है, जन्मभूमि के यूटोपियन चित्र और यथार्थ के अंतर है, कर्मभूमि के संघर्ष हैं, विडंबनाएं हैं, दोनों से न्याय करने की जिद है।   देखते हैं संग्रह में  उन्होंने  यथार्थ   से जुड़े किन पहलूओं को रेखांकित किया गया है और  प्रवासी जीवन के यथार्थ  ने उनकी किन धारणाओँ और स्थापनाओं पर आघात किया है?


 चाहे परिवार हो, चाहे संस्थाएं हो , या मित्रता हो पद्मेश गुप्त रिश्तों की कद्र करते हैं , उन्हें निभाते हैं , चाहे उसके लिए कितना भी  त्याग ना करना पढ़े। प्रवास में कैरियर  दुनियावी सफलता तो देता है, पर जीवन के सबसे नाजुक , कोमल  , घनिष्ठ , आत्मीय संबंधों को छीन लेता है । ‘घड़ी, छड़ी और ऐनक’  कविता  इस नाते से बहुत खूबसूरत कविता है कि इसमें जिन प्रतीकों को लिया है , वे प्रतिनिधि प्रतीक हैं, इनका होना ही कविता है, माता - पिता का कंधा, दृष्टि न बन पाने की पीड़ा।  कितना दर्द होता है जब सारी सुविधाएं प्रदान करने का आश्वासन देने के बाद भी कवि मां के चुप होठों से यह पढ़ लेता है-
शायद उसी ऐनक को पहन कर
लिखा था माँ ने,
देख सकती हूँ
तुम्हारी तस्वीर मैं
बिना इस ऐनक के भी
और हमारे यहाँ
पिता की छड़ी
लकड़ी की नहीं
लड़के की होती है।  ( घड़ी ,छ़ड़ी और ऐनक)

उसे यह मशीनी जीवन और सुविधाओं की दौड़ रास नहीं आती। वह लिखता है-

हाँ, अच्छा था मेरा मुट्ठी भर व्यापार
दो कदमों का आंगन और एक अँगूठी प्यार..

उसे एक ग्लानि बोध है कि एक पक्षी होते हुए भी कबूतर अपने जन्मस्थान छोड़ना पसंद नहीं करता बल्कि अपना जीवन दे देता है-
वह कबूतर था
व्यापारी नहीं,
वरना लेकर कुछ दाम 
वह भी बेच देता
अपना जन्म स्थान।

और कर लेता बसेरा
कहीं किसी और पेड़ पर,
हमारी तरह 
करता गर्व 
कहीँ.. किसी और देश पर ( कबूतर)
उसे समझ में आता है कि इस सफलता की क्या कीमत है?  

परंतु कालक्रम में वह जहां है , उस देश के  प्रति भी  उसका दायित्व बोध धीरे-धीरे जाग्रत होता है और  वह अपने को कृष्ण की स्थिति में देखने लगता है , उसे दोहरी नागरिकता में एक समाधान मिलता है-
एक नए स्वप्न में जी रहे हैं
आजकल कृष्ण,
किसी ने उनसे कहा है
कि वे अब
दोनो के साथ रह सकते हैं,
यशोदा के भी और देवकी के भी....

कि वे किससे अधिक प्रेम करते हैं
यशोदा से, या फिर देवकी से!
उतारना चाहते हैं वे जन्मभूमि  का कर्ज़
निभाना चाहते हैं कर्मभूमि के  कुछ फर्ज़ ( दोहरी नागरिकता)


परंतु प्रवासी के पास सब कुछ गुडी -गुडी नहीं है  । भारत में बेईमानी , धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार पर उनकी कविता 'घर एक मंदिर' एक सशक्त कविता है। यह कविता डॉ सत्येनद्र श्रीवास्तव की कविता ‘ बार-बार भारत ‘ की इस अर्थ में याद दिलाती है कि वह भारतीय समाज की विसंगतियों को और लोगों के दोहरे चरित्र को बहुत ही प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करती है-

जिन्होंने पहले मुझे मित्र कह कर गले से लगाया
फिर...
फिर मेरे ख़ून और पसीने को
घोल कर चाय में मिलाया,
मैने हर शिकारी के चेहरे के पीछे
कहीं बाघ तो कहीं गिद्ध के
चरित्र को पाया।  (घर एक मंदिर)

इतने पीड़ादायक अनुभवों के बाद भी कवि नही  चाहता है कि उनके पुत्र के भारत के प्रति प्रेम में कोई कमी आए-

भय मुझे हारने की नहीं
कुछ खोने का है,
खोना नहीं चाहता
मैं नई पीढ़ी का विश्वास।
जिसके मन के आकाश में
एक भारत है
भारत में छोटा सा घर है
घर में नन्हा सा मंदिर है ( घर एक मंदिर) 
अगर भारत के प्रति प्रेम के बावजूद विडंबनाओं और अंतरविरोधों को समझने की   यह दृष्टि नहीं होती तो पद्मेश जी के प्रवासी अनुभव कैरिकेचर हो जाते, युटोपियन हो जाते , उनमें यथार्थ की जीवंत तस्वीर नहीं दिखाई देती !


इस तरह से हम देखते हैं कि पद्मेश की कविताओं  में प्रवासी जीवन के टुकड़े ही नहीं है , खंडित आईना नहीं है, बल्कि समग्र चित्र हैं,  विस्थापन की पीड़ा है, प्रवास के गहरे प्रतीक हैं, रिश्तों की उजास के खो जाने का दर्द है, दायित्व ना निभा पाने की कसक है, दोनों देशों और समाजों से न्याय करने का संकल्प है, दोनों देशों और समाजों के प्रति प्रतिबद्धता का भाव है, अनुभवोॆें को सरलीकृत ना करने की विज़न  है, परंतु परिवार, समाज, देश और संस्कृति के प्रति गहरा प्रेम हर  वाक्य , हर शब्द , उसके रेशे-रेशे में गुुंथा हुआ है.। संकलन से स्पष्ट  है कि क्यों उनकी कविताओं को प्रवास की प्रतिनिधि कविताएं और क्यों  उन्हें  प्रतिनिधि प्रवासी कवि माना जाता है ! या क्यों यह संग्रह प्रवासी कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है!

इस खंड की कविताओं में हमें एक कवि और कविता के बोद्दिक विकास की कड़ी दिखाई देती है। यह संग्रह प्रवास की कविताओं को केंद्र में रख कर चलता है परंतु जीवन Static नहीं है। धीरे -धीरे अपनी कर्मभूमि की समस्याएं / वास्तविकताएँ , सरोकार लेखन के केंद्र  मे आते हैंं । इस दृष्टि से Brexit कविता महत्वपूर्ण है। यहां कवि अपने समय के सवाल से भिड़ता है - वह जागते -सोते इसी मुद्दे की बात कर रहा है। यह सवाल , यह चिंता , यह सरोकार उसके अवचेतन में चला गया है। वह कहता है- 
आज सुबह जब मैं सो कर उठा
लगा जैसे मेरी अँग्रेज़ी माँ 
मुझे गोद में लेकर 
छोड़ रही है
मेरे फ्रांसीसी पिता का घर’ Brexit 
उसे इस देश के इतिहास से मतलब है और भविष्य पर नजर है। प्रवासी दृष्टि उसी रंगभेद को समझने की भी दृष्टि देती है जब वह देखता है कि एक बारह साल के बच्चे को आईना तोड़ने पर जेल में डाला जा रहा है । तो वह दंगों को सिर्फ कानून और व्यवस्था के प्रश्न के बजाए उपनिवेशवाद और रंगभेद के संदर्भ में देखता है।  इस खंड में एक बेहद खूबसूरत कविता 'गेहूँआ रंग' है जो लाहौर और लखनऊ को जोड़ती है और भारत की गंगा -जमुनी तहज़ीब का चित्रण कराती है। एक मुस्लिम वृद्द को रंगभेदी गुंडों से बचाते हुए वे लिखते हैं-

वे बोले ‘कहाँ से हो?’
मैंने कहा ‘लखनऊ’ से, और आप?
वे बोले ‘लाहौर’ से!
तब से 
आने लगी है मुझे
हर ‘गेहुएँ’
गेहूँ के रंग में
अपने परिवार की महक। ( गेंहूँआ रंग)




  आज के विश्व मानव Global Citizen वाले समय में वह नोटबंदी में एक बुजुर्ग महिला और उसके परिवार की पीड़ा को महसूस करते हैं। ऐसे ही कैंसर पर लिखी कविता उनकी संवेदनशीलता , सकारात्मक जीवन दृष्टि , हर परिस्थिति में आशावादिता और मनुष्यता को अभिव्यक्त करने वाली है।  एक बड़े फलक , एक व्यापक परिप्रेक्ष्य  में लिखी हुई यह कविताएं इस संग्रह को उदारता, व्यापकता, यथार्थ की ठोस  जमीन  और बड़ा आकाश देती हैं। 
आइए अब उस खंड की बात करें जो उनके व्यक्तिव की विशेषताओं , उसकी बुनावट, उसकी जीवन दृष्टि और सरोकारों  को स्पष्ट करता है।

पद्मेश गुप्त के व्यक्तित्व में असाधरणता है । वे लिखते हैं

नहीं जानता मैं
कौन से रास्ते पर जा रहा हूं
लेकिन
तुम तक पहुंचूगां ज़रूर
क्योकि
निकल पड़ा हूं मैं ! - रास्ता 

यह कोई और कहता है तो हम समझते कि यह व्यक्ति हाँक रहा है। पर पद्मेश के व्यक्तित्व में कुछ खास है। उनकी विनम्रता , खिलंदड़ा स्वभाव, अदम्य कर्मठता , सकारात्मक चिंतन , जिंदगी के सीधे, ईमानदार फंडे, घोर आशावादिता , व्यक्तियों की समझ, रिश्तों को बनाने - निभाने की गजब की ताकत, षड्यत्रों और षडयंत्रकारियों के बीच में रह कर भी वैसा ना करने और ना बनने का संकल्प उसे विशेष बनाता है  । एक दिलचस्प अभिव्यक्ति देखिए-
बिगुल नहीं 
बीन बजा कर 
जीतता हूँ मैं युद्ध - ( य़ुद्द)
पर उनके व्यक्तित्व का परत -दर -परत यह विश्वलेषण यहां क्यों ? क्योंकि यह खंड उनकी जीवन दृष्टि  , उनके परिवेश के षड्यंत्रों, हर कीमत पर सकारात्मक रहने की संकल्प शक्ति को दर्शाता है । हर परिस्थिति में सकारात्मक व्यक्ति ही यह लिख सकता है-





मुझे 
सीढ़ी बनाने वालों
मैं उस धातु का बना हूँ
जब तुम गिरोगे 
बैसाखी हो जाऊँगा। ( बैसााखी)

इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से भाषा , संस्कृति और सम सामयिक सवालों पर तो बात हुई । पर व्यक्ति का जीवन बहुरंगी है। मुस्कराहट, ठहाके, खिलंदड़ापन, जीवंतता , संबंधो को बनाना और निभाना उसी व्यक्ति के लिए संभव है , जिसने जीवन को हर रंग में जिया हो। संग्रह की प्रेम कविताएं मिलन, जुदाई को खूबसूरत शब्दों, प्रतीकों, मूड्स के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। सहज, आत्मीय, प्रेम की इन छोटी कविताओं में प्रेम के  संवेदन क्षणों को पकड़ कर प्रेम कविताओं का कोलाज़ विकसित किया गया है। कविताएं आकार में छोटी हैं, पर व्यंजना गहरी है, कहे -अनकहे का संतुलन है,  धार है, प्रेम के आकर्षक प्रतीक हैं  , और भाव, शिल्प , संवेदन का बेहद खूबसूरत संयोजन है- 
वहाँ तक ले चलें
जहाँ चट्टान पर किसी,
खींच सकूँ एक आकृति
जिस पर तुम्हारे नाम के साथ
कोई हिस्सा मेरे नाम का भी जुड़ा हो
और झोंका हवा का कोई
उस पर रिश्ते की सतह बिछा न सके’(  नाम) 




पद्मेश की कविताओं की एक विशेषता यह है कि वह पठनीय होेने के साथ-साथ वाचन की भी कविताएं हैंं । ब्रिटेन की समृद्द कवि सम्मेलन परंपरा के वे उज्जवल स्तंभ हैं और ब्रिटेन के सबसे लोकप्रिय कवि हैं । उनकी  कविताओं की तात्कालिकता, प्रत्युत्पन्नमति ( Presence of Mind) लय, मुक्त छंद पर गहरी पकड़, सही शब्दों और प्रतीकों के चुनाव से उनकी  कवि सम्मेलनों की लोकप्रियता को जाना -समझा जा सकता है। शायद ही कोई प्रवासी कवि हो जो इस प्रभाव के साथ अपनी कविताओं को पढ़ सैंकड़ो लोगों को हिंदी कविता और उसके माध्यम से  भारत और उसकी भाषाओ से जोड़ सकता हो। एक कवि के रूप में उनका आकलन करते समय उनके इस पक्ष का विशेष उल्लेख आवश्यक है।
बात गंगा की हो और गंगोत्री की ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी । पद्मेश जी के व्यक्तित्व को समझने के लिेए उनके पिता लखनऊ के पूर्व मेयर रहे , हिंदी के कवि, लेखक, विद्दान, यायावर , ज्ञान के पहाड़ और विनम्रता के सागर को जानना आवश्यक है। ऐसे असाधारण और चमत्कृत करने वाले प्रवाह का उद्गगम अगर ऐसा धवल , पवित्र और सबका मंगल करने वाला ना होता तो हमें ऐसे बहुमुखी  प्रतिभा का  समर्पित व्यक्तित्व नहीं मिल पाता । दाऊ जी के व्यक्तित्व के पवित्रता का एक उदाहरण मैं नहीं भूल सकता । अमेरिका में हिंदी की लेखिका हैं, श्रीमती विशाखा, वे  मेडिकल फील्ड में काम करती है। वर्ष 2007  में न्यूयार्क में विश्व हिंदी सम्मेलन के पश्चात मैं और दाऊ जी उनके घर गए। रात के 9-10 बजे होंगे । श्रीमती विशाखा के घर में केंसर का एक मरीज था। हम तीन लोग थे । सब थके हुए थे और भोजन करना चाहते थे। पर अगले दिन सुबह जल्दी उस मरीज को हस्तपताल ले जाना था. बिशाखा जी जिस तरह से मरीज से दाऊ जी का जिक्र किया था , वह उसी रात परामर्श और प्रेरणा और आशा के दीपक के रूप में  दाऊ जी से मिलना चाहता था। दाऊ जी तुरंत उसके पास गए । रात देर तक उसके साथ रहे । शायद तब तक जब तक वह स्वयं ना सो गया। जीवन के इन अंतिम अंधेरे क्षणों में किसी के जीवन में प्रेम , संवेदन और आशा का दीपक जलाने वाले दाऊ जी के जीवन  के इस  प्रेरणादायी पहलू को भुलाना असंभव है। ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्व और परिवार के संस्कार को अगली पीढ़ी में ले जाकर  ही यह महती उपलब्धियां हासिल की गई  हैं।
यह संग्रह जिनको समर्पित है , पद्मेश जी को संबंल देने वाले श्री के.के . श्रीवास्तव और सुश्री तितिक्षा को भी बधाई जो सदा उनके प्रयासों में सहयोगी और संबल बने हैं।  
इस संग्रह के प्रकाशक  श्री अरूण महेश्वरी  के संग्रह को  उनके विशेष प्रयत्नों के लिए अनेकश: शुभकामनाएँ    


अनिल शर्मा ' जोशी'
द्दितीय सचिव, भारतीय उच्चायोग, सुवा
Email - anilhindi@gmail.com

सोमवार, 2 जनवरी 2017

अरक्षित - यों होता तो क्या होता




Anil Sharma ' Joshi '
anilhindi@gmail.com

एक प्रवासी - स्मृतियों और संभावनाओं में जीता 

अरक्षित दिशांतर मे प्रकाशित डॉ शालिग्राम शुक्ल द्वारा लिखी कहानी है । कहानी की बुनावट बड़ी महीन है और कहानी परत- दर- परत अपनी जड़ों से दूर रहने वाले भारतीय के अंतर्मन को इस तरह खोलती है कि बसंत, सूर्योदय, गोधूलि की बेला , फूल , चलती हुई हवा, पानी सब एक ही समय मे कई अर्थ देने लगते हैं, ज्यादातर अपने बाहरी रूपाकार से अलग... एक डरा देने वाला ठंडापन । जिसमें मानवीय उष्मा की आंच जैसे समाप्त हो गई है, हवा की अल्हड़ता साँय – साँय में बदल गई है, पानी जैसे खामोश है , शांत है पर अदर से जैसे बिना गंध की कोई सड़ांध, मृत्यु की आहट । जैसे जड़ो से कटे अपने प्रतिरूप को जीवन भर जीने की विवश , अभिशप्त । अपने से बार – बार पूछता.। एक गहरे – सार्थक प्रामाणिक प्रवासी अनुभव का टुकड़ा...। 
कहानी में पांच पात्र हैं- बलराज, एक हिंदुस्तानी मूल का व्यक्ति जिसका परिचय लेखक ने इस रूप में दिया है..शांत स्वभाव के लंबे और स्वस्थ व्यक्ति । एक सफल व्यक्ति जो अपनी रूसी पत्नी तमारा के साथ अमेरीका के सैनफ्रैस्सिको नगर मे रहते हैं। पिछले तीस साल से तमारा से विवाहित । उनके विवाहित जीवन को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है ‘ दोनों का अपना जीवन पिछले तीस साल से इस विदेशी शहर में सम और शांत रहा है। संतानहीनता कभी खली नहीं। विवाह के पहले दिन ही दोनों ने निश्चय कर लिया था कि इस करूणाहीन कठिन दुनिया में वे अपनी संतति लाने का अपराध न करेंगे। इस प्रतीक्षा के पीछे तमारा को किन्हीं कल्पित –अकल्पित यातनाओं की भयंकर स्मृति थी  जिससे अवगत हो उस रूसी सौंदर्य में कांपते बलराज बिजावत ने अपनी आहूति दे दी थी ‘  ।  मिसेज राव एक विधवा हैं , दीनहीन, कृपाकांक्षी सरल, सहज, विनम्र, सेवाभावी भारतीय गुणों से युक्त। मिसेज स्मिथ रंगभेद में विश्वास करने वाली गोरी महिला और उसका अपंग –अपराधी भाई हम्फ्री।
तमारा मिसेज राव पर दया कर उन्हें अपने घर में ले आती हैं। यह उनका आग्रह है, अनुरोध है जिसे बलराज अस्वीकार नहीं करता । पर यहीं से बलराज के सरल रेखा में चल रहे जीवन में परिवर्तन आता है...मिसेज राव की उपस्थिति , उनका दया  भरा साँवला दरिद्र रूप, और उनके चलने और बात करने का तरीका, उनका सब कुछ बलराज को किसी दूसरे देशकाल में ले जाता जहाँ जीवन की दूसरी संभावनाएं किसी वृक्ष में प्रतीक्षा करते फलों सी लगतीं- आकर्षक और सदा के लिए अप्राप्य। विचार उठने लगते उस जीवन के जो कभी रूपायित नहीं हुआ , जिसका अस्तित्व  सिवा उनके उदास दिल मे कहीं और नहीं था। । 
जैसे यह बरसों से शांत तालाब किसी कंकड़ की प्रतीक्षा कर रहा था । जैसे खिड़की किसी हवा के अंदर आने की .. । बलराज का परिचय कहानी में कुछ इस तरह से आता है। ..शांत स्वभाव के लंबे और स्वस्थ व्यक्ति। यह शांत , लंबे और  स्वस्थ तीनों शब्दों का खुलासा होते- होते साफ होता है कि इनके अर्थ सतही तरीके से नहीं किए जा सकते । क्या यहां शांत होने का अर्थ मृत होना तो नहीं है  बहुधा ऐसा होता है कि विदेश मे जाने से पूर्व व्यक्ति का व्यक्तित्व विकसित हो चुका होता है। गाहे – बगाहे , प्रासांगिक या अप्रासांगिक अपनी प्रतिक्रिया देना।  गांव –मोहल्ले में मिलने वाले मोची, भिखारी ,दुकानदार से बतियाना, परिचितों – रिश्तेदारों के दुख- सुख में द्रवित होना , होली में उत्साह की भांग, दीवाली में संबंघों की रोशनी और ईद में परिवेश की मिठास..। बसंत के साथ फूलों से तितलियों सी शरारत, पतझड़ में सूर्यास्त सा पीलापन सब उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनते हैं और फिर विदेश में पहुंच कर एकाएक यह उमंग,उत्साह,सहजता, आत्माभिव्यक्ति, अनुभूति की सहजता की जगह एक कुलीनता , एक संयम एक ठंडापन  ले लेता है।
‘ वे प्राय किसी ऐसे समय में उतर – उतर जाते जो केवल संभव था कहीं दूर अतीत मे। वे उन संभाव्य क्षणों को चेतना में उभरते देखते रहे। उनके लिए बाहर की तेज हवाएं धीमी चलती, फुलवारी की भिनभिनाती मक्खियां बेहद शांत लगती। न जाने किन हाथों के स्पर्श रोमांचित कर जाते। 
 और यहीं सांकेतिक रूप से कहानी का सबसे मार्मिक स्थल आता है   ‘ एक रात बगीचे से निकल बलराज बाहर फेंस के उस पार चले गए जहां एक पुरानी कब्रगाह थी। सालों से हवा और सूर्य कब्र के पत्थरों को फाड़ चुके थे और जीव – जंतु उनकी दरारों से बाहर आते-जाते रहते। वहीं किसी हत्या के चिह्न थे- पंख और काला चोंच। बलराज की आंखे भीग चलीं- वे किसी घाव के आँसू नहीं थे, वे अपने प्रति दया और करूणा के आंसू थे और तमारा को अपना प्रतिरूप दे उसे छलने के आंसू थे। 
एक दिन बलराज काम पर नहीं गए । बसंत के उस दिन प्रकाश में तनिक भी करूणा नहीं थी। वह स्मृतियां और घाव उघारता रहा । किसी दूसरे देशकाल के दिन पुराने छेद लिए कंबंलों से महकते रहे जिसमें से पतिंगे पर झाड़ते  उड़ते रहे। 
तीस साल पहले भारत लौट गया होता , वहां घर बसाया होता, वहाँ की हवा में, धूप में, ऋतुओं मे तन-मन पका होता तो .. यों होता तो क्या होता  ? ‘ बलराज का बल जा चुका है उसकी शांतता में धीरे – धीरे एक मौत की आहट है । ना हो सकने का दुख ... संभावनाओं के संसार को ना पाने की पीड़ा..। उसके शारिरिक – सामाजिक रूप का लंबा होना एक आभास है, वर्ना तो वह एक छाया है. । तमाशा फिल्म के रणबीर कपूर की तरह।  उसकी स्वस्थता तो एक मिथ है, वह अपनी देह में नहीं है , वह वहां से हजारों किलोमीटर दूर । वह उन्हीं स्मृतियों और संभावनाओं मे जी रहा है। शांत , लंबा , स्वस्थ.....एक आभास , एक विडंबना ..जीवन में दीमक की तरह लग गया मृत्युबोध.. ।
...पर यह भी जानते थे कि बलराज के फैशनेबुल लिबास के पीछे छिपा था। कोई भाऱतीय भाषा बोलता सांवला पुरूष जिसकी सचाई सामने बैठे बसंत निहारते पुरूष से भिन्न थी। पिछले तीस साले से बलराज का उस प्रतिपुरूष से बराबर युद्द होता रहा। वे हमेशा अपने इस प्रतिरूप से हारते रहे हैं। 
प्राय इस विदेश के रेगिस्तान में जलती उनकी त्वचा और देह की जलती हड्डियां चाहतीं किसी हरी ठंडी अमराई में प्रवेश कर जाना ..
गंगा तट के किसी अतीत और सैन्फ्रंसिस्को के इस वर्तमान के बीच का सारा जीवन एक पाखंड था जिससे मुक्ति के सभी पथ बंद थे। 

मिसेज राव के प्रति बलराज का आकर्षण भी एक विश्लेषण मांगता है। उनके बारे में लिखा गया है ‘  चेहरा जो अनाकर्षक नहीं था..  उसके कई दांत अनुपस्थित लगे। उनके सांवले हाथ कितने दुर्बल और जीवनहीन लग रहे थे.. । तो फिर कौन सा आकर्षण था जिससे शांत और संतुलित बलराज के जीवन में तूफान आ गया था। ... उसमें भारत के किसी खंड का इतिहास पढ़ा जा सकता था। उसकी हड्डियों में व्यक्त थी वहां की कथाएं। ...     
‘ मिसेज़ राव की इस घर में उपस्थति, उनका दया भरा साँवला दरिद्र रूप , और उनके चलने और बात करने का तरीका, उनकी सरल हिंदी, उनका सब कुछ बलराज को दूसरे देशकाल में ले जाता जहां जीवन की दूसरी संभावनाएं, किसी वृक्ष पर प्रतीक्षा करते फलों सी लगतीं..आकर्षक और सदा के लिए अप्राप्य। उन क्षणो मे उनकी काया कांप – कांप उठती । विचार उठने लगते उस जीवन के जो कभी रूपायित नहीं हुआ , जिसका अस्तित्तव सिवा उनके उदास दिल में और कहीं नहीं था। “ 
तो उस अनाकर्षक अधेड़, कृपाक्, कई अनुपस्थित दांतों वाली मिसेज़ राव के दरिद्र रूप ने उनके तीस साल के वैवाहिक जीवन में तूफान ला दिया । बड़ी बात है यह आकर्षण  ‘ उसकी सरल हिंदी .. ‘  का था, उसके चलने और बात करने के तरीके का था , जो उसे दूसरे देशकाल में ले जाती , जहां वह अप्राप्य और आकर्षक संभवानाओं के साथ खेलने लग जाता। जहां एक नदी बहती हुई हिलोरें मारने लगती ।  उसका होना एक संभावना था , एक सुरंग थी जिसके पार प्रकाश भी हो सकता था। वो गोधूलि के समय प्रकाश के सपने देखने लगा । वर्तमान को अगोचर कर  उसका मन अतीत और संभवानाओं का ड्यूट गाने लगा और शांत पानी में चलती नाव एकाएक तूफान से घिर गई। 
एक दिन वह सत्य स्वीकार कर लेता है  बकवास नहीं तमारा । सारे सहवास के दिन मैं नाटक करता रहा , फिर मैने उस नाटक में विश्वास कर लिया, और अब उसका आखेट बना जाल में फंसे वृद्ध पशु – सा निरीह हो चला हूँ। “ उसने तमारा को भी मुक्ति का  अवसर दिया । 
मिसेज़ राव के घर मे प्रवेश के समय ही उनके पड़ोस में रहने वाली तमारा की सहेली स्मिथ ने तमारा से नई अपरिचित सांवली हिदुस्तानी औरत के  बारे में पूछा था। ‘ अपने जीवन में सांवले रंग के लोगों का विश्वास मिसेज़ स्मिथ नहीं कर सकी थीं। अपनी इस बीमारी को वे अपना गुण समझतीं और किसी अंधी परंपरा से जोड़ स्वयं को विशिष्ट। ‘ 
प्राय इस विदेश के रेगिस्तान में जलती उनकी त्वचा और देह की जलती हड्डियां चाहतीं किसी हरी ठंडी अमराई में प्रवेश कर जाना ..
तमारा अपने पति के मिसेज़ राव के प्रति आकर्षण को देख मिसेज स्मिथ का सहारा लेती है । कहानी का अंतिम प्रसंग एक लाश मिलने से शुरू होता है कोई अधजली लाश मिसीसिपी प्रांत के ग्लेंडोरा कस्बे के पास कपास के खेत में मिलती है। उसके बाद रंगभेदी व्यवहार का एक समाजशाश्त्र दिखाई देता है . .. अपराधी जो भी हो लेकिन लोग अक्सर कहते पाए जाते कि किस तरह वह विदेशी स्त्री जेम्स हम्फ्री के साथ कई बार दुर्व्यवहार करती देखी गई थी, कि किस तरह वह अपंग के जीवन से जोंक की तरह चिपक गई थी। यह सब कुछ तमाम टूटे हुए सपनों , शराब के अतिशय व्यवहार और शारिरिक हिंसा के संदर्भ में और भी भेदभरा ही चलता । जेम्स हंफ्री के कई अक्षम्य अपराधों को जानते हुए भी लोग उस भाषा – हीन अकिंचन का पक्ष लेने को तैयार नहीं थे। 
मिसेज स्मिथ कहती ‘ उस विधवा का तुम्हारे घर आना अशुभ था तमारा और अपने अपंग भाई की सेवा में मेरा भेजना उससे भी अशुभ था’’ , मिसेज़ स्मिथ कहतीं और अमरीका के दुर्भाग्य पर तरसती जहां तमाम अप्रीतकर अवांछित जीव बेरोक-टोक दरिद्र देशों से आते हैं.। 
सब जानने के बाद इसका अंत एक चरम पर पहुंचता है .. फिर अपनी निरीहता पर तरस खाने लगे। इस जीवन से उन्हें भय होने लगा था। मृत्यु से नहीं । कितने लंबे अर्से से वे मर रहे हैं, वे यह जानते हैं...
वे नदी को अपने विचारों की नदी समझ , उसका आशीष पाने उसके खतरनाक पानी में प्राय उतर जाते हैं। उनकी भीगी कांपती देह को बांहों में लिए चिंतित तमारा स्वयं से पूछती कि वे कब तक बलराज की रक्षा करती रहेंगी। 
किसी एक कहानी में प्यार – विश्वास , अविश्वास, मन की कई स्तरों पर जीता व्यक्ति, विदेश में देश, अंतर – देशीय विवाहों की जटिलताएं, जीवन में भाषा, विश्वासों और जीवन –शैली की भुमिका, एक स्थान पर  पनपे व्यक्तित्व को दूसरी जगह खिलने और विकसित होने की समस्या , रंगभेद का भयावह रूप दिखाई देता है। 
कविता में कहानी को बुना होना कई बार शानदार कविता का सृजन करता है। उसी प्रकार कहानी में कविता की भाषा होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है । उस रूप में यह कहानी एक लंबी कविता लगती है। मार्मिक कविता , मृत्युबोध को जीती, प्रेम के तरल , स्निग्ध, पहलूओं से साक्षात्कार करती , मौसम के उपलब्ध प्रतीकों से रस लेती कथा को आगे बढ़ती है । जहां हवा एक पात्र है और मक्खियां भी.. । कब्र पर चोंच और पंख .. एक मार्मिक अभिव्यंजना है। सटीक, अर्थाभिव्यक्ति में सक्षम और सतह से बहुत गहरे कई अर्थ बिंब बिखेरती..... । 
सबसे बड़ी बात है कि यह कहानी बहुत घटनाओं की बात नहीं करती , स्थितियां तो एक बड़े फलक पर जाने का रास्ता है। बल्कि इन सबके माध्यम से हमारे होने, या ना होने या होने की शर्तों और स्थितियों की बात करती है। होने ना होने की भाव जगत और मनोजगत से पुष्टि मांगती है। उमंग,उत्साह, उद्देगों, तरलताओं का साक्ष्य मांगती हैं । एक विदेशी भूमि में खिलने और गंध देन के लिए  भाषा, संवेंदनाओं, जीवन शैली के पानी – खाद  को एक आवश्यक शर्त के रूप में प्रस्तुत करती है।